नई दिल्ली: जिंदगी में उतार-चढ़ाव और मुश्किल परिस्थितियां हर किसी के सामने आती हैं। ऐसे में बच्चों को सिर्फ अच्छे नंबर लाने या प्रतियोगिता में जीतने के लिए तैयार करना ही काफी नहीं है। उन्हें यह भी सिखाना जरूरी है कि असफलता, निराशा और चुनौतियों का सामना कैसे किया जाए।
बचपन से ही अगर बच्चों को अपनी समस्याओं का हल खुद तलाशने, गलतियों से सीखने और लगातार प्रयास करते रहने की आदत डाली जाए, तो उनमें मुश्किल परिस्थितियों से निपटने का आत्मविश्वास विकसित हो सकता है। माता-पिता का रवैया इसमें अहम भूमिका निभाता है।
खेल से सिखाएं जीत-हार का मतलब
बच्चों में मुश्किलों से लड़ने की क्षमता विकसित करने की शुरुआत खेल के जरिए की जा सकती है। खेल में कभी जीत मिलती है तो कभी हार, और यही बच्चों को दोनों परिस्थितियों को स्वीकार करना सिखाती है।
अगर बच्चा हार जाए तो उसे डांटने या निराश करने के बजाय समझाएं कि हार उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने का मौका है। उसे अपनी कमियों पर काम करने और अगली बार बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करें।
माता-पिता अपने जीवन में मिली असफलताओं और बाद में हासिल की गई सफलता के अनुभव भी बच्चों के साथ साझा कर सकते हैं। इससे बच्चे समझ पाएंगे कि असफलता जिंदगी का अंत नहीं है, बल्कि उससे सीखकर आगे बढ़ा जा सकता है।
छोटी जिम्मेदारियां देकर बनाएं आत्मनिर्भर
बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम खुद करने दें। जैसे स्कूल बैग तैयार करना, खिलौने समेटना, किताबें व्यवस्थित करना या अपनी जरूरी चीजों का ध्यान रखना।
इस दौरान उनसे गलतियां भी होंगी, लेकिन हर छोटी गलती उनके लिए सीखने का अवसर बन सकती है। अगर बच्चा अपना टिफिन या कोई जरूरी सामान भूल जाता है, तो हर बार तुरंत उसकी मदद करने के बजाय उसे अपनी गलती समझने का मौका दें।
इससे बच्चे धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारियों को लेकर सजग होंगे और उनमें आत्मनिर्भरता की भावना विकसित होगी। आगे चलकर यही आदत उन्हें मुश्किल परिस्थितियों में खुद फैसले लेने में मदद कर सकती है।
धैर्य सिखाना भी है बेहद जरूरी
तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में बच्चों को अक्सर हर चीज तुरंत मिल जाने की आदत हो जाती है। जब मनचाहा नतीजा जल्दी नहीं मिलता तो वे निराश या हतोत्साहित हो सकते हैं।
ऐसे में बचपन से उन्हें समझाना जरूरी है कि हर सफलता तुरंत नहीं मिलती। मेहनत के साथ धैर्य और लगातार प्रयास भी जरूरी हैं। रास्ते में आने वाली परेशानियों से घबराने के बजाय उन्हें एक-एक करके दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।
अगर बच्चे छोटी उम्र से ही धैर्य रखना, असफलता को स्वीकार करना और अपनी गलतियों से सीखना सीखते हैं, तो आगे चलकर उनमें चुनौतियों का सामना करने का आत्मविश्वास मजबूत हो सकता है।