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फीस के लिए किडनी बेचने वाला MBA छात्र आयुष अब ICU में, डोनर और रिसीवर  लखनऊ रेफर

यूपी: कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के हैलेट अस्पताल से सामने आए चर्चित किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट मामले में डोनर आयुष कुमार और रिसीवर पारुल तोमर की तबीयत बिगड़ने के बाद दोनों को बेहतर इलाज के लिए लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया संस्थान (RML) रेफर कर दिया गया है। दोनों मरीजों को एडवांस लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस से पुलिस सुरक्षा के बीच लखनऊ भेजा गया, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनका इलाज संभाल रही है। बताया जा रहा है कि ट्रांसप्लांट अप्रूवल और मेडिकल कॉम्प्लिकेशन्स की वजह से उन्हें सुपर स्पेशियलिटी सुविधा वाले सेंटर में शिफ्ट करना जरूरी हो गया था। कानपुर पुलिस पहले ही इस पूरे अवैध किडनी ट्रांसप्लांट नेटवर्क का भंडाफोड़ कर चुकी है, जिसमें अब तक 6 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

इस पूरे मामले की सबसे दर्दनाक कड़ी डोनर आयुष कुमार की कहानी है। बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला आयुष देहरादून में MBA का छात्र है। शुरुआती जांच में सामने आया कि आर्थिक तंगी और फीस के दबाव में उसे दलालों ने किडनी बेचने के लिए फंसाया। उसे 6 से 10 लाख रुपये देने का लालच दिया गया, जबकि पुलिस जांच में यह बात सामने आई कि रिसीवर से 50 से 60 लाख रुपये या उससे ज्यादा तक वसूले गए। आयुष ने पुलिस को बताया कि पिता के निधन के बाद परिवार पहले से मुश्किल हालात में था और इसी कमजोरी का फायदा उठाकर रैकेट ने उसे जाल में फंसाया।

आयुष के हाथ पर बना “I Love You Mom” टैटू उसकी मां से गहरे लगाव को दिखाता है। डॉक्टरों और पुलिस सूत्रों के मुताबिक, वह बार-बार हाथ जोड़कर यही गुहार लगा रहा है कि इस घटना की जानकारी उसकी मां तक न पहुंचे, क्योंकि वह यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी। आईसीयू में भर्ती आयुष की हालत पर डॉक्टर लगातार नजर बनाए हुए हैं। इसी बीच देहरादून से उसकी एक करीबी दोस्त भी कानपुर पहुंची, जिसने पुलिस की मौजूदगी में ICU में उससे मुलाकात की। दोनों की मुलाकात बेहद भावुक रही और दोस्त ने उससे कहा—“बताते तो हम मदद करते…”

किडनी रैकेट का बड़ा नेटवर्क, कई शहरों तक लिंक

पुलिस जांच में सामने आया है कि यह कोई छोटा मामला नहीं, बल्कि एक बड़े संगठित किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का हिस्सा है। रैकेट में डॉक्टर दंपति, अस्पताल संचालक, दलाल और बाहर से आने वाली मेडिकल टीम शामिल थी। फर्जी दस्तावेजों के जरिए गैर-रिश्तेदार डोनरों को मरीजों से जोड़ा जाता था और ऑपरेशन अलग-अलग अस्पतालों में कराए जाते थे ताकि रिकॉर्ड बिखरा रहे। जांच एजेंसियों को शक है कि पिछले दो वर्षों में 40 से 50 से ज्यादा अवैध ट्रांसप्लांट इसी नेटवर्क के जरिए कराए गए। इसके तार लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और नेपाल तक जुड़े होने की आशंका है।

फिलहाल स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है। यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि आर्थिक मजबूरी कैसे युवाओं को ऐसे खतरनाक जाल में धकेल देती है। साथ ही यह अवैध अंग व्यापार के उस काले कारोबार को भी उजागर करती है, जो समाज के कमजोर तबकों को सबसे ज्यादा निशाना बनाता है।

news desk

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