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अमेरिका के एक फैसले से ‘चाबहार’ प्रोजेक्ट पर आया संकट!  चीन – पाकिस्तान को घेरने की रणनीति में अब क्या करेगा भारत?

ईरान में भारत की सबसे महत्वाकांक्षी विदेशी परियोजनाओं में से एक चाबहार पोर्ट पर अब गंभीर संकट मंडराता दिख रहा है. पाकिस्तान को बाईपास कर मध्य एशिया तक सीधी पहुंच देने वाली लगभग 3000 करोड़ रूपये की यह रणनीतिक प्रोजेक्ट, अब अमेरिका के एक ऐलान से अनिश्चितता के घेरे में आ गया है. माना जा रहा है कि यह फैसला भारत की ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय व्यापार और सामरिक संतुलन पर गहरा असर डालेगा. साथ ही चीन पर बन रहा दवाब भी कम होगा.

‘चाबहार’ से थी भारत को रणनीतिक बढ़त!

चाबहार पोर्ट योजना ईरान के दक्षिण-पूर्व में स्थित बंदरगाह को विकसित करने की भारत की महत्वाकांक्षी परियोजना है, जिसका उद्देश्य भारत, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बीच व्यापारिक गलियारे के रूप में काम करना है. इसे पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित किए जा रहे ग्वादर पोर्ट का जवाब भी माना गया था. चाबहार को हासिल करना भारत की एक बड़ी रणनीतिक जीत थी. इस प्रोजेक्ट के तहत भारत पाकिस्तान के रणनीतिक ग्वादर पोर्ट को बाईपास करते हुए सीधे अफगानिस्तान और यूरोप तक पहुंच जाता और इससे भारत की ऊर्जा और व्यापारिक संसाधनों की आपूर्ति भी आसान से हो सकेगी. साथ ही ग्वादर पोर्ट के जरिए चीन और पाकिस्तान की मूवमेंट पर भी नजर रहती.

कब हुई थी ‘चाबहार’ की शुरूआत ?

चाबहार पोर्ट परियोजना की औपचारिक शुरुआत 2003 में भारत और ईरान के बीच समझौते से हुई थी. उस समय भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी के बीच हुए इस समझौते के तहत भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने में सहयोग करने और अफ़ग़ानिस्तान तक पहुच के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर (सड़क और रेल मार्ग) बनाने पर सहमति जताई थी. हालांकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और राजनीतिक कारणों से उस समय शुरू नहीं हो पाई.

2004 में जब मनमोहन सिंह सरकार सत्ता में आई, तब भारत ने ईरान के साथ मिलकर इस पोर्ट को विकसित करने में रुचि दिखाई, लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों के ईरान पर लगे प्रतिबंध से इस प्रोजेक्ट में बाधाएं आईं. लेकिन तकनीकी अध्ययन, सड़क निर्माण और अफगानिस्तान तक संपर्क मार्ग की योजनाएं तैयार की गई. लेकिन राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय दबावों से बाधाएं भी आती रही.

2016 में भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते ने, इस परियोजना को नई गति दी. दरअसल अमेरिका ने अभी तक ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को लेकर जो कड़े प्रतिबंध लगाए थे, 2018 में उससे कुछ विशेष छूट दी गई, क्योंकि चाबहार अफगानिस्तान की शांति और पुनर्निर्माण में अच्छा कदम साबित हो सकता था.

अमेरिका के फैसले का क्या पड़ेगा भारत पर असर ?

अब अमेरिका द्वारा चाबहार पोर्ट पर दी गई 2018 की छूट को खत्म करने का फैसला भारत के हितों पर गंभीर असर डाल सकता है. अमेरिका ने यह छूट 29 सितम्बर 2025 से वापस लेने का निर्णय लिया है. इसके बाद भारत द्वारा चाबहार पोर्ट में किया गया निवेश और परिचालन सीधे अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ सकता है.

इस पोर्ट में भारत ने बड़ा निवेश किया है और इसके ज़रिए अफ़ग़ानिस्तान व मध्य एशिया तक बिना पाकिस्तान से गुज़रे सीधा व्यापारिक मार्ग बनाया था. अब छूट हटने से भारतीय कंपनियों और बैंकों पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा बढ़ जाएगा, जिससे परियोजना की गति धीमी हो सकती है. साथ ही यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है. कूटनीतिक रूप से भी भारत के लिए अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन साधना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा. वहीं लगातार अमेरिकी नीतियों से भारत के हितों पर भी संकट मंडरा रहा है.

news desk

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