नई दिल्ली: ईरान युद्ध के चलते पैदा हुए ऊर्जा संकट ने दुनिया को एक बार फिर वैकल्पिक ईंधन पर गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। भारत में पेट्रोल-डीजल के विकल्पों की तलाश लंबे समय से चल रही है, लेकिन अब इस दिशा में तेजी देखी जा रही है। इलेक्ट्रिक और फ्लेक्स फ्यूल के साथ-साथ सरकार अब हाइड्रोजन तकनीक को भी भविष्य के बड़े विकल्प के रूप में देख रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि हाइड्रोजन फ्यूल आखिर बनता कैसे है और क्या यह इलेक्ट्रिक और सीएनजी वाहनों को चुनौती दे सकता है।
हाइड्रोजन को भले ही नया ईंधन माना जा रहा हो, लेकिन इसकी तकनीक अब तेजी से विकसित हो रही है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहनों में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया होती है, जिससे बिजली पैदा होती है। इस पूरी प्रक्रिया में केवल पानी की भाप निकलती है, जिससे यह लगभग प्रदूषण रहित तकनीक मानी जाती है।
हाइड्रोजन मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है—ग्रीन, ग्रे और ब्लू। इनमें ग्रीन हाइड्रोजन सबसे स्वच्छ मानी जाती है, क्योंकि इसे सौर और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार किया जाता है। जबकि ग्रे और ब्लू हाइड्रोजन जीवाश्म ईंधन से बनती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है।
हाइड्रोजन फ्यूल का सबसे बड़ा फायदा भारी और लंबी दूरी के वाहनों में देखने को मिलता है। इलेक्ट्रिक वाहनों में जहां बैटरी का वजन, चार्जिंग समय और सीमित रेंज समस्या बनती है, वहीं हाइड्रोजन इस चुनौती का समाधान पेश करता है।
यह तकनीक खासकर ट्रक, बस, इंटरसिटी परिवहन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर के लिए अधिक उपयोगी मानी जा रही है। इसमें फ्यूल भरने में कम समय लगता है और वाहन लंबी दूरी तय कर सकते हैं।
भारत सरकार ने 2023 में नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की शुरुआत की थी। इस मिशन के तहत 2030 तक हर साल 50 लाख मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है।
देश में तूतीकोरिन, पारादीप और कांडला जैसे बंदरगाहों पर हाइड्रोजन हब बनाए जा रहे हैं, जहां उत्पादन और निर्यात दोनों की तैयारी है। वहीं जीएआईएल और एनटीपीसी जैसी कंपनियां शहरों की गैस पाइपलाइन में हाइड्रोजन मिश्रण के प्रयोग भी कर रही हैं।
हालांकि हाइड्रोजन को भविष्य का मजबूत ईंधन माना जा रहा है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन अभी महंगा है। इसे स्टोर करना और ट्रांसपोर्ट करना भी जटिल प्रक्रिया है।
देश में रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर लगभग न के बराबर है और उत्पादन से उपयोग तक ऊर्जा की काफी हानि होती है। इन्हीं कारणों से फिलहाल इलेक्ट्रिक वाहन सामान्य उपयोग के लिए ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बने हुए हैं।
हाइड्रोजन को अक्सर इलेक्ट्रिक वाहनों के विकल्प के तौर पर देखा जाता है, लेकिन दोनों की भूमिका अलग-अलग है। इलेक्ट्रिक वाहन शहरों और निजी उपयोग के लिए बेहतर हैं, जबकि हाइड्रोजन भारी और लंबी दूरी के परिवहन के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में परिवहन क्षेत्र किसी एक तकनीक पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि इलेक्ट्रिक, हाइड्रोजन, बायोफ्यूल और फ्लेक्स फ्यूल मिलकर ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेंगे।
हाइड्रोजन तुरंत पेट्रोल या इलेक्ट्रिक वाहनों की जगह नहीं लेगा, लेकिन बढ़ती तेल कीमतों, ऊर्जा सुरक्षा और प्रदूषण की चुनौतियों के बीच यह एक मजबूत विकल्प बनकर उभर सकता है। यदि उत्पादन लागत कम होती है और इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित होता है, तो यह भारत के स्वच्छ और आत्मनिर्भर परिवहन भविष्य का अहम हिस्सा बन सकता है।
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