नई दिल्ली । भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ (Vikram-1) की ऐतिहासिक सफलता के पीछे कई ऐसे अनाम नायकों की अनसुनी मेहनत है, जिन्होंने देश को एयरोस्पेस सेक्टर की नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है।
इन्हीं में से एक बड़ा और प्रेरणादायक नाम है पृथ्वी संघानी (Prithvi Sanghani) का। गुजरात के जामनगर में खेत-खलिहानों के बीच पली-बढ़ी एक किसान की बेटी ने अपनी प्रतिभा के दम पर विक्रम-1 रॉकेट के ‘दिमाग’ यानी ऑटोपायलट कंट्रोल सिस्टम (Autopilot Control System) को विकसित करने वाली टीम का नेतृत्व किया है।
जब कोई रॉकेट अंतरिक्ष की ओर उड़ान भरता है, तो उसकी सफलता और विफलता के बीच का अंतर केवल कुछ सेकंड्स और सटीक गणना (Algorithms) पर टिका होता है।
विक्रम-1 रॉकेट में पृथ्वी संघानी की जिम्मेदारी ‘ऑटोपायलट सिस्टम’ की थी। यह प्रणाली उड़ान के दौरान रॉकेट की गति, संतुलन और दिशा को नियंत्रित करती है। यदि हवा के दबाव या तकनीकी वजहों से रॉकेट अपने रास्ते से भटकता है, तो यह ऑटोपायलट सिस्टम ही उसे सेकंड के हजारवें हिस्से में सही मार्ग पर वापस लाता है।
पृथ्वी संघानी की यात्रा यह साबित करती है कि दृढ़ संकल्प के आगे परिस्थितियां कभी बाधा नहीं बनतीं:
पृथ्वी संघानी की यह सफलता देश के छोटे शहरों, गांवों और साधारण परिवारों से आने वाले उन युवाओं के लिए एक मजबूत संदेश है जो अंतरिक्ष विज्ञान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में अपना करियर बनाना चाहते हैं।
“सफलता के लिए किसी बड़े मेट्रो शहर या संपन्न पृष्ठभूमि का होना जरूरी नहीं है। अगर आपकी बुनियादी समझ मजबूत है और आपमें नई तकनीक सीखने का जज्बा है, तो आप देश के सबसे बड़े स्पेस मिशन का नेतृत्व कर सकते हैं।”
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