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Success Story : किसान के बेटे पृथ्वी संघानी ने रचा इतिहास, ऑटोपायलट सिस्टम से भारत की अंतरिक्ष उड़ान को दी नई दिशा

नई दिल्ली । भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ (Vikram-1) की ऐतिहासिक सफलता के पीछे कई ऐसे अनाम नायकों की अनसुनी मेहनत है, जिन्होंने देश को एयरोस्पेस सेक्टर की नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है।

इन्हीं में से एक बड़ा और प्रेरणादायक नाम है पृथ्वी संघानी (Prithvi Sanghani) का। गुजरात के जामनगर में खेत-खलिहानों के बीच पली-बढ़ी एक किसान की बेटी ने अपनी प्रतिभा के दम पर विक्रम-1 रॉकेट के ‘दिमाग’ यानी ऑटोपायलट कंट्रोल सिस्टम (Autopilot Control System) को विकसित करने वाली टीम का नेतृत्व किया है।

  • जामनगर के खेत से अंतरिक्ष की उड़ान: किसान परिवार में जन्मी पृथ्वी संघानी ने राजकोट से बी.टेक करने के बाद पुणे से ‘मिसाइल टेक्नोलॉजी’ में मास्टर्स (M.Tech) की डिग्री हासिल की।
  • DRDO का अनुभव: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) में प्रोजेक्ट इंजीनियर के रूप में भारत के प्रमुख रक्षा मिसाइल कार्यक्रमों में निभाई अहम भूमिका।
  • विक्रम-1 का ‘माइंड मास्टर’: स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) में ‘कंट्रोल सिस्टम लीड’ बनकर विक्रम-1 रॉकेट के दिशा-निर्देशन और ऑटोपायलट सिस्टम को किया तैयार।
  • बेटियों के लिए नई मिसाल: स्टेम (STEM – Science, Technology, Engineering, Math) क्षेत्रों में करियर बनाने का सपना देखने वाली देश की लाखों युवा लड़कियों के लिए बनीं रोल मॉडल।


रॉकेट को दिशा दिखाने वाला ‘ऑटोपायलट सिस्टम’: कितना जटिल था यह काम?

जब कोई रॉकेट अंतरिक्ष की ओर उड़ान भरता है, तो उसकी सफलता और विफलता के बीच का अंतर केवल कुछ सेकंड्स और सटीक गणना (Algorithms) पर टिका होता है।

विक्रम-1 रॉकेट में पृथ्वी संघानी की जिम्मेदारी ‘ऑटोपायलट सिस्टम’ की थी। यह प्रणाली उड़ान के दौरान रॉकेट की गति, संतुलन और दिशा को नियंत्रित करती है। यदि हवा के दबाव या तकनीकी वजहों से रॉकेट अपने रास्ते से भटकता है, तो यह ऑटोपायलट सिस्टम ही उसे सेकंड के हजारवें हिस्से में सही मार्ग पर वापस लाता है।

DRDO से प्राइवेट स्पेस क्रांति तक: सपनों की नई उड़ान

पृथ्वी संघानी की यात्रा यह साबित करती है कि दृढ़ संकल्प के आगे परिस्थितियां कभी बाधा नहीं बनतीं:

  1. शुरुआती शिक्षा: साधारण पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने राजकोट से अपनी बेसिक इंजीनियरिंग पूरी की।
  2. विशेषज्ञता: पारंपरिक इंजीनियरिंग शाखाओं को छोड़कर उन्होंने मिसाइल टेक्नोलॉजी जैसा जटिल विषय चुना।
  3. रक्षा अनुसंधान (DRDO): डीआरडीओ में काम करते हुए उन्होंने अपनी तकनीकी क्षमताओं को तराशा।
  4. मिशन आगमन (Mission Aagaman): भारत के निजी अंतरिक्ष स्टार्टअप ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ से जुड़कर उन्होंने इतिहास रचा और विक्रम-1 मिशन को सफल बनाया।


छोटे शहरों और ‘STEM’ में बेटियों के लिए बड़ा संदेश

पृथ्वी संघानी की यह सफलता देश के छोटे शहरों, गांवों और साधारण परिवारों से आने वाले उन युवाओं के लिए एक मजबूत संदेश है जो अंतरिक्ष विज्ञान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में अपना करियर बनाना चाहते हैं।

“सफलता के लिए किसी बड़े मेट्रो शहर या संपन्न पृष्ठभूमि का होना जरूरी नहीं है। अगर आपकी बुनियादी समझ मजबूत है और आपमें नई तकनीक सीखने का जज्बा है, तो आप देश के सबसे बड़े स्पेस मिशन का नेतृत्व कर सकते हैं।”

news desk

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