जयपुर: महाराणा प्रताप के संघर्षपूर्ण जीवन से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में से एक “घास की रोटी” का प्रसंग है। वर्षों से यह कहा जाता रहा है कि हल्दीघाटी के युद्ध के बाद जब महाराणा प्रताप को परिवार और सेना के साथ जंगलों में रहना पड़ा, तब उन्होंने घास की रोटियां खाकर जीवनयापन किया। लेकिन क्या वास्तव में घास की रोटी बनाई और खाई जा सकती है? इस सवाल का जवाब इतिहास और विज्ञान दोनों के नजरिए से दिलचस्प है।
विशेषज्ञों के अनुसार घास की रोटी खाना संभव तो है, लेकिन यहां “घास” का अर्थ सामान्य हरी घास से नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टि से गेहूं, चावल, जौ, मक्का और बाजरा जैसी फसलें भी घास कुल के पौधों से संबंधित हैं। इंसान इन पौधों के बीजों का सेवन करता है, न कि उनकी पत्तियों का।
इतिहास में अकाल और संकट के दौर में लोगों द्वारा जंगली घासों के बीजों का उपयोग भोजन के रूप में किए जाने के उल्लेख मिलते हैं। राजस्थान के थार और अरावली क्षेत्रों में पाई जाने वाली कुछ जंगली घासों के बीजों को एकत्र कर उनका आटा तैयार किया जाता था।
इन बीजों में पोषक तत्व मौजूद होते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उनसे रोटियां बनाई जा सकती हैं। इसलिए “घास की रोटी” का आशय आमतौर पर जंगली घास के बीजों से बनी रोटियों से माना जाता है, न कि खेतों या मैदानों में उगने वाली साधारण हरी घास से।
वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य का पाचन तंत्र गाय, भैंस या अन्य जुगाली करने वाले पशुओं जैसा नहीं होता। हरी घास में मौजूद सेल्युलोज को पचाने के लिए विशेष प्रकार के जीवाणु और पाचन प्रणाली की आवश्यकता होती है, जो इंसानों में नहीं पाई जाती।
यही वजह है कि सीधे हरी घास खाकर पेट भरना संभव नहीं है। ऐसा करने से पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। हालांकि जंगली घासों के बीजों को पीसकर बनाया गया आटा भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस सवाल पर इतिहासकारों की राय एक जैसी नहीं है। लोककथाओं और राजस्थानी साहित्य में यह प्रसंग बेहद लोकप्रिय है। कई रचनाओं में वर्णन मिलता है कि संघर्ष के दिनों में महाराणा प्रताप के परिवार को घास की रोटियां खानी पड़ी थीं।
हालांकि आधुनिक इतिहासकार इस घटना को पूरी तरह प्रमाणित तथ्य नहीं मानते। उनका तर्क है कि अरावली क्षेत्र के भील समुदाय महाराणा प्रताप के सहयोगी थे और वे भोजन तथा अन्य आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था करने में सक्षम थे।
इतिहासकार यह भी बताते हैं कि महाराणा प्रताप छापामार युद्ध की रणनीति अपना रहे थे और उनके पास रसद पहुंचाने के गुप्त मार्ग मौजूद थे। इसके अलावा भामाशाह द्वारा दी गई आर्थिक सहायता ने भी उनकी सैन्य और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान की थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि घास की रोटी का प्रसंग महाराणा प्रताप के संघर्ष, आत्मसम्मान और त्याग को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत करता है। समय के साथ यह कथा लोकस्मृति और साहित्य का हिस्सा बन गई।
हालांकि उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य इस घटना की पूरी तरह पुष्टि नहीं करते, लेकिन यह जरूर दर्शाते हैं कि कठिन परिस्थितियों में लोगों ने जंगली बीजों और वन उत्पादों के सहारे जीवन बिताया था।
देश के कुछ हिस्सों, विशेषकर बुंदेलखंड और मध्य भारत के क्षेत्रों में आज भी जंगली अनाजों और घास कुल के कुछ पौधों के बीजों का उपयोग भोजन के रूप में किया जाता है। कठिन आर्थिक परिस्थितियों में लोग इनका आटा बनाकर रोटियां तैयार करते हैं।
वनस्पति वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्तमान में इस्तेमाल होने वाले कई अनाज भी हजारों वर्ष पहले जंगली घासों से विकसित हुए थे। इसलिए जंगली बीजों से भोजन तैयार करने की परंपरा पूरी तरह असंभव नहीं बल्कि ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित मानी जाती है।
बुंदेलखंड क्षेत्र में मिलने वाला फिकर नामक जंगली अनाज आज पोषण विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इसे कई लोग जंगली गेहूं भी कहते हैं। इसमें फाइबर, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यह अनाज पाचन तंत्र को बेहतर बनाने, वजन नियंत्रित रखने और शरीर को ऊर्जा देने में मददगार माना जाता है। ग्लूटेन से परहेज करने वाले लोगों के लिए भी इसे उपयोगी विकल्प बताया जाता है। इसी वजह से इसकी खेती और उपयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
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