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कबूतर ही क्यों बना दुनिया का पहला ‘मैसेंजर’? जानिए वो वैज्ञानिक वजह, जिसके आगे तीतर-मोर भी पड़ गए थे पीछे

नई दिल्ली: आज के दौर में संदेश भेजने के लिए मोबाइल और इंटरनेट सबसे बड़ा माध्यम बन चुके हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब महत्वपूर्ण संदेशों को पहुंचाने की जिम्मेदारी कबूतर निभाते थे। युद्ध हो, राजकीय सूचना हो या दूर बैठे किसी व्यक्ति तक संदेश पहुंचाना हो, कबूतरों का इस्तेमाल सदियों तक किया गया। दिलचस्प बात यह है कि यह परंपरा केवल लोककथाओं या फिल्मों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण भी मौजूद हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार कबूतरों में अपने घर या ठिकाने तक वापस पहुंचने की असाधारण क्षमता होती है। यही विशेषता उन्हें अन्य पक्षियों से अलग बनाती है और इसी कारण उन्हें संदेशवाहक के रूप में चुना गया।

क्यों चुने जाते थे सिर्फ कबूतर?

कबूतरों की सबसे बड़ी खासियत उनकी ‘होमिंग एबिलिटी’ यानी अपने घर का रास्ता खोज लेने की क्षमता है। इन्हें चाहे सैकड़ों किलोमीटर दूर छोड़ दिया जाए, फिर भी वे अपने मूल ठिकाने तक लौट सकते हैं।

यही कारण था कि प्राचीन काल में संदेश को एक छोटे कागज पर लिखकर कबूतर के पैर में बांध दिया जाता था। इसके बाद कबूतर उड़कर सीधे अपने निर्धारित ठिकाने तक पहुंच जाता था। तीतर, मोर या अधिकांश अन्य पक्षियों में यह क्षमता इतनी विकसित नहीं पाई जाती।

हजारों साल पुराना है कबूतर संदेश सेवा का इतिहास

इतिहासकारों के अनुसार करीब दो हजार वर्ष पहले भी कबूतरों का उपयोग संचार माध्यम के रूप में किया जाता था। कई ऐतिहासिक उल्लेख बताते हैं कि युद्ध और राजनीतिक घटनाओं की खबरें कबूतरों के जरिए दूर-दराज इलाकों तक पहुंचाई जाती थीं।

युद्धकाल में जब संचार के अन्य साधन उपलब्ध नहीं थे, तब प्रशिक्षित कबूतर सूचना पहुंचाने का सबसे भरोसेमंद माध्यम माने जाते थे।

क्या कबूतरों के पास होता है प्राकृतिक जीपीएस?

वैज्ञानिक वर्षों से इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि आखिर कबूतर अपना रास्ता कैसे पहचान लेते हैं। शोधों में सामने आया है कि उनके शरीर में ऐसी जैविक क्षमताएं मौजूद हैं जो उन्हें दिशा का सटीक अनुमान लगाने में मदद करती हैं।

कुछ अध्ययनों के अनुसार कबूतरों के कानों के आंतरिक हिस्से में मौजूद विशेष संरचनाएं पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को महसूस करने में भूमिका निभा सकती हैं। यही कारण है कि कई वैज्ञानिक उन्हें प्राकृतिक जीपीएस वाला पक्षी भी कहते हैं।

आंखों में छिपा है दिशा पहचानने का रहस्य

वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत प्रमुख सिद्धांतों में से एक कबूतरों की दृष्टि से जुड़ा है। माना जाता है कि उनकी आंखों के रेटिना में क्रिप्टोक्रोम नामक विशेष प्रोटीन पाया जाता है।

यह प्रोटीन संभवतः पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को महसूस करने में मदद करता है। आसान भाषा में कहें तो कबूतर अपने आसपास की दुनिया के साथ-साथ चुंबकीय संकेतों को भी समझ सकते हैं, जिससे उन्हें सही दिशा का अंदाजा मिलता है।

चुंबकीय शक्ति भी करती है मदद

एक अन्य वैज्ञानिक सिद्धांत के मुताबिक कबूतरों के शरीर में मौजूद सूक्ष्म चुंबकीय कण उन्हें दिशा पहचानने में सहायता करते हैं। ये कण पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के साथ प्रतिक्रिया करके उन्हें मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं।

इसी वजह से कबूतर लंबी दूरी की उड़ानों के दौरान भी रास्ता भटकते नहीं हैं और अपने गंतव्य तक पहुंचने में सफल रहते हैं।

मोर, तीतर और दूसरे पक्षी क्यों नहीं बन पाए संदेशवाहक?

मोर और तीतर जैसे पक्षी आमतौर पर लंबी दूरी तक नियमित उड़ान भरने और निश्चित स्थान पर लौटने के लिए प्रसिद्ध नहीं हैं। इसके विपरीत कबूतरों को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जा सकता है और वे अपने घर लौटने की स्वाभाविक प्रवृत्ति रखते हैं।

यही कारण है कि इतिहास में संदेश पहुंचाने की जिम्मेदारी कबूतरों को मिली, जबकि अन्य पक्षी इस भूमिका में कभी प्रभावी साबित नहीं हो सके।

आज भी शोध का विषय है कबूतरों की दिशा पहचानने की क्षमता

तकनीक के इस युग में भले ही कबूतरों की संदेश सेवा इतिहास का हिस्सा बन चुकी हो, लेकिन उनकी दिशा पहचानने की अद्भुत क्षमता आज भी वैज्ञानिकों के लिए आकर्षण का विषय बनी हुई है। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र, जैविक संवेदनाओं और प्राकृतिक नेविगेशन प्रणाली को समझने के लिए कबूतरों पर लगातार शोध किए जा रहे हैं।

 

vineet verma

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