नई दिल्ली: बारिश आने से पहले मोर का नाचना, कोयल की कूक का तेज हो जाना या अबाबील का नीचे उड़ना भारतीय समाज में लंबे समय से मौसम के संकेत माने जाते रहे हैं। पीढ़ियों से लोग इन पक्षियों के व्यवहार को देखकर बारिश का अनुमान लगाते आए हैं। अब वैज्ञानिक अध्ययनों ने भी इस पारंपरिक समझ को काफी हद तक सही साबित किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि पक्षी वातावरण में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को इंसानों से कहीं पहले महसूस कर लेते हैं, जिससे उन्हें मानसून और अन्य मौसमीय घटनाओं का आभास हो जाता है।
सलीम अली पक्षीविज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि मानसून और पक्षियों के व्यवहार के बीच गहरा संबंध है। यही वजह है कि कई देशों में जानवरों और पक्षियों के व्यवहार को प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के रूप में भी देखा जा रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार अमेरिका में वर्ष 2014 में आए एक भीषण बवंडर से करीब 24 घंटे पहले गोल्डन-विंग्ड वार्बलर पक्षियों ने अपना प्रवास मार्ग बदल लिया था। बाद में हुए शोध में सामने आया कि पक्षियों ने सैकड़ों किलोमीटर दूर बन रहे तूफान से उत्पन्न निम्न आवृत्ति वाली ध्वनियों को महसूस कर लिया था और समय रहते सुरक्षित स्थानों की ओर बढ़ गए थे।
विशेषज्ञों का कहना है कि पक्षियों के पास कोई अलौकिक शक्ति नहीं होती, बल्कि उनकी जैविक संरचना उन्हें पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। मानसून आने से पहले वातावरण में कई तरह के बदलाव शुरू हो जाते हैं, जिनमें वायुदाब में कमी, नमी में वृद्धि और हवाओं की दिशा में परिवर्तन प्रमुख हैं।
पक्षी इन सूक्ष्म परिवर्तनों को आसानी से महसूस कर लेते हैं। उनके शरीर की त्वचा, पंख और संवेदनशील अंग वातावरण में होने वाले बदलावों पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। जैसे ही दक्षिण-पश्चिमी हवाएं सक्रिय होती हैं और नमी बढ़ती है, पक्षियों का व्यवहार भी बदलने लगता है।
पक्षी वैज्ञानिकों के मुताबिक पक्षियों का शरीर एक अत्यंत विकसित जैविक मौसम केंद्र की तरह काम करता है। उनके कानों के पास मौजूद विशेष संरचना, जिसे पैराटिम्पैनिक ऑर्गन कहा जाता है, हवा के दबाव में होने वाले मामूली बदलावों को भी पहचान सकती है।
इसके अलावा उनकी आंखों में मौजूद क्रिप्टोक्रोम प्रोटीन पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को महसूस करने में मदद करता है। कई पक्षी अत्यंत निम्न आवृत्ति वाली ध्वनियों को भी सुन सकते हैं, जो तूफान, समुद्री हलचल या बिजली गिरने जैसी घटनाओं से पैदा होती हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि पक्षियों के पंखों में मौजूद संवेदनशील कोशिकाएं नमी और वायु दबाव में होने वाले बदलावों को तुरंत महसूस कर लेती हैं। यही कारण है कि मौसम बदलने से पहले उनके व्यवहार में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देने लगता है।
भारत में मानसून का सबसे चर्चित प्राकृतिक संकेत मोर का नृत्य माना जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब वातावरण में नमी बढ़ती है और वायुदाब कम होने लगता है, तब मोर अधिक सक्रिय हो जाते हैं।
यह व्यवहार उनके प्रजनन काल से भी जुड़ा होता है। मानसून के आगमन से पहले बनने वाली अनुकूल परिस्थितियां उन्हें नृत्य और प्रणय प्रदर्शन के लिए प्रेरित करती हैं। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मोर के नृत्य को बारिश की दस्तक माना जाता है।
लोक मान्यताओं में कहा जाता है कि जब अबाबील जमीन के करीब उड़ने लगे तो बारिश निकट होती है। वैज्ञानिक इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण बताते हैं।
बारिश से पहले वातावरण में नमी बढ़ने के कारण छोटे कीट-पतंगे नीचे की ओर आ जाते हैं। भोजन की तलाश में अबाबील भी उनके पीछे नीचे उड़ने लगती है। लोगों को यह व्यवहार बारिश का संकेत दिखाई देता है, जो कई बार सही साबित होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार मानसून से पहले बगुले अक्सर जलाशयों के किनारों से हटकर ऊंचे स्थानों और पेड़ों पर बैठना शुरू कर देते हैं। जलस्तर में संभावित बदलावों के प्रति उनकी संवेदनशीलता के कारण इसे कई क्षेत्रों में बाढ़ के संकेत के रूप में भी देखा जाता है।
वहीं कोयल की तेज और लगातार सुनाई देने वाली आवाज भी मानसून के आगमन से जोड़ी जाती है। वैज्ञानिक बताते हैं कि गर्मियों के अंत में दिन की अवधि बढ़ने से उसके प्रजनन हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं, जिससे उसकी कूक अधिक सुनाई देने लगती है।
साइबेरिया, मध्य एशिया और यूरोप से आने वाले कई प्रवासी पक्षी भी मौसमी बदलावों के अनुसार अपना प्रवास तय करते हैं। फ्लेमिंगो, ग्रेट स्निप और गडवाल जैसे पक्षी अक्सर मानसून से पहले भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में पहुंच जाते हैं।
वैज्ञानिक मानते हैं कि इन पक्षियों का समय पर आगमन इस बात का संकेत है कि वे मौसम में होने वाले बड़े बदलावों को पहले ही भांप लेते हैं। यही कारण है कि पक्षियों को प्रकृति के सबसे भरोसेमंद जैविक संकेतकों में गिना जाता है।
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