नई दिल्ली: सुबह आंख खुलते ही मोबाइल चेक करना, खाना खाते वक्त वीडियो देखना और दोस्तों के बीच बैठकर भी सोशल मीडिया स्क्रॉल करते रहना आज आम आदत बन गई है। स्मार्टफोन ने जिंदगी को आसान जरूर बनाया है, लेकिन जरूरत से ज्यादा स्क्रीन पर समय बिताना हमारी दिनचर्या, आपसी रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। सवाल यह है कि मोबाइल हमारी जरूरत बना हुआ है या हम धीरे-धीरे उसके इस्तेमाल पर जरूरत से ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं?
क्या डिजिटल दुनिया असल जिंदगी पर पड़ रही है भारी?
ऑनलाइन गेमिंग, वीडियो स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया ने मनोरंजन से लेकर पढ़ाई और कामकाज तक कई चीजों को आसान बना दिया है। लेकिन जब हर खाली पल फोन देखने में गुजरने लगे, तो परिवार के साथ बातचीत, दोस्तों से मिलने और अपने पसंदीदा शौक पूरे करने के लिए समय कम पड़ सकता है।
खाना खाते समय मोबाइल चलाना, बातचीत के बीच बार-बार नोटिफिकेशन देखना या सड़क पार करते हुए स्क्रीन पर ध्यान लगाए रखना ऐसी आदतें हैं, जो वास्तविक जिंदगी के अनुभवों और आसपास की गतिविधियों से ध्यान हटा सकती हैं।
हालांकि, तकनीक का इस्तेमाल अपने आप में नुकसानदायक नहीं है। इसका प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि स्क्रीन का उपयोग किस उद्देश्य से, कितनी देर और किन गतिविधियों की जगह किया जा रहा है।
ज्यादा स्क्रीन टाइम और मानसिक स्वास्थ्य का क्या है कनेक्शन?
स्क्रीन टाइम और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध को लेकर कई अध्ययन किए गए हैं। वर्ष 2018 में Preventive Medicine Reports में प्रकाशित एक अध्ययन में अमेरिका के 40,337 बच्चों और किशोरों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था।
अध्ययन में पाया गया कि रोजाना सात घंटे या उससे अधिक समय स्क्रीन पर बिताने वाले 14 से 17 वर्ष के किशोरों में एक घंटे तक स्क्रीन इस्तेमाल करने वालों की तुलना में डिप्रेशन और एंग्जायटी से जुड़े संकेत मिलने की संभावना दोगुने से अधिक थी।
हालांकि, इस तरह के नतीजों से यह साबित नहीं होता कि स्क्रीन टाइम ही मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का एकमात्र कारण है। इसके बावजूद, यह अध्ययन डिजिटल आदतों पर ध्यान देने और स्क्रीन के इस्तेमाल में संतुलन बनाए रखने की जरूरत को रेखांकित करता है।
स्क्रीन से कब लेना चाहिए ब्रेक?
अगर मोबाइल इस्तेमाल करने के कारण आपकी नींद, रोजमर्रा के काम, पढ़ाई या लोगों से बातचीत प्रभावित होने लगी है, तो अपनी डिजिटल आदतों पर ध्यान देना जरूरी है। शुरुआत कुछ छोटे बदलावों से की जा सकती है।
- खाने के समय फोन से दूरी: भोजन करते वक्त मोबाइल देखने के बजाय खाने और परिवार के साथ बातचीत पर ध्यान दें।
- बातचीत के दौरान नोटिफिकेशन बंद रखें: दोस्तों या परिवार के साथ समय बिताते समय फोन को अलग रखने की कोशिश करें।
- शारीरिक गतिविधियों के लिए समय निकालें: टहलना, व्यायाम करना और पसंदीदा शौक अपनाना दिनचर्या में संतुलन बनाने में मदद कर सकता है।
- सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल घटाएं: रात में फोन चलाने की आदत कम करें, ताकि नींद के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
- बच्चों की डिजिटल आदतों पर ध्यान दें: उनकी उम्र, पढ़ाई, नींद और शारीरिक गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए स्क्रीन के इस्तेमाल के लिए उचित सीमाएं तय करें।
यह भी समझना जरूरी है कि काम, पढ़ाई और मनोरंजन के लिए स्क्रीन की जरूरत अलग-अलग होती है। इसलिए हर व्यक्ति के लिए एक ही समय-सीमा को सही मानने के बजाय अपनी दिनचर्या और जरूरतों के अनुसार संतुलन बनाना बेहतर है।
मोबाइल छोड़ना नहीं, इस्तेमाल का तरीका बदलना है जरूरी
आज की जिंदगी में तकनीक से पूरी तरह दूरी बनाना न तो जरूरी है और न ही हमेशा व्यावहारिक। जरूरत इस बात की है कि मोबाइल हमारे काम आए, न कि उसका इस्तेमाल हमारी नींद, रिश्तों और जरूरी गतिविधियों पर हावी हो जाए।
डिजिटल दुनिया से जुड़े रहने के साथ-साथ अपनों के लिए समय निकालना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना और खुद को आराम देना भी जरूरी है। स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण की शुरुआत छोटे बदलावों से हो सकती है, जो धीरे-धीरे बेहतर दिनचर्या बनाने में मदद कर सकते हैं।