नई दिल्ली: शरद पूर्णिमा की चांदनी को लेकर भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई मान्यताएं और परंपराएं प्रचलित हैं। कहीं इस रात मां लक्ष्मी की पूजा कर रातभर जागने की परंपरा है, तो कहीं इसे श्रीकृष्ण की महारास लीला से जोड़कर देखा जाता है। ओडिशा में यह पर्व कुमार पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है, जबकि बिहार के मिथिला क्षेत्र में कोजगरा की रस्मों का खास महत्व है। आखिर एक ही पूर्णिमा से जुड़ी इन परंपराओं की कहानियां क्या हैं?
1. कोजागरी पूर्णिमा: मां लक्ष्मी किसे देती हैं आशीर्वाद?
पश्चिम बंगाल में शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है। इस अवसर पर मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है और कई परिवार रातभर जागकर भजन-कीर्तन तथा आराधना करते हैं। इस परंपरा के पीछे ‘को जागर्ति?’ यानी ‘कौन जाग रहा है?’ की मान्यता जुड़ी हुई है।
लोकविश्वास के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागकर उनकी आराधना करने वाले भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। इसी विश्वास के चलते घरों में पूजा की तैयारी की जाती है, आंगन में अल्पना बनाई जाती है और देवी का स्वागत किया जाता है।
2. दो बहनों की व्रत कथा: नियमों का पालन क्यों माना जाता है जरूरी?
शरद पूर्णिमा से जुड़ी एक प्रचलित व्रत कथा में साहूकार की दो बेटियों का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, दोनों पूर्णिमा का व्रत रखती थीं, लेकिन बड़ी बेटी जहां व्रत के नियमों का पूरी तरह पालन करती थी, वहीं छोटी बेटी से ऐसा नहीं हो पाता था।
विवाह के बाद छोटी बेटी को संतान से संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ा। वह अपनी समस्या लेकर बड़ी बहन के पास पहुंची और इसका कारण जानना चाहा। इस कथा के अलग-अलग रूप प्रचलित हैं, लेकिन इसका प्रमुख संदेश व्रत के प्रति श्रद्धा और नियमों के पालन से जुड़ा है।
3. ब्रज की महारास लीला: शरद पूर्णिमा से क्या है श्रीकृष्ण का संबंध?
उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां इस पर्व को भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि शरद ऋतु की मनमोहक चांदनी रात में श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ रास रचाया था।
श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कंध में रासलीला का वर्णन मिलता है। ब्रज की धार्मिक परंपरा में इसे केवल नृत्य या उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और भगवान के प्रति समर्पण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसी कारण शरद पूर्णिमा पर कृष्ण भक्ति और रासलीला से जुड़े आयोजन विशेष आकर्षण का केंद्र बनते हैं।
4. ओडिशा और मिथिला की परंपराएं: कहीं जीवनसाथी की कामना, तो कहीं नवविवाहितों की रस्में
शरद पूर्णिमा को ओडिशा में कुमार पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस दिन अविवाहित लड़कियां सुबह सूर्य और शाम को चंद्रमा की पूजा करती हैं। प्रचलित परंपरा के अनुसार, वे अच्छे जीवनसाथी और सुखी भविष्य की कामना करती हैं। इस पर्व का संबंध भगवान कार्तिकेय के कुमार स्वरूप से भी जोड़ा जाता है।
वहीं, बिहार के मिथिला क्षेत्र में कोजगरा की परंपरा का विशेष महत्व है। यहां नवविवाहित जोड़ों से जुड़ी रस्में निभाई जाती हैं। कई परिवारों में दूल्हे के घर मखाना, पान और मिठाइयां भेजने की परंपरा भी प्रचलित है।
इस तरह शरद पूर्णिमा का पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रंगों के साथ मनाया जाता है। कहीं मां लक्ष्मी की आराधना और रात्रि जागरण प्रमुख है, तो कहीं श्रीकृष्ण की महारास लीला, अच्छे जीवनसाथी की कामना और नवविवाहितों से जुड़ी रस्में इस पूर्णिमा को खास बनाती हैं।