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आंबेडकर जयंती पर विशेष: वोट बैंक नहीं, ये विरासत की जंग है!

SYED MOHAMMAD ABBAS
Last updated: April 14, 2026 11:51 am
SYED MOHAMMAD ABBAS
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भारतीय राजनीति में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम एक शिखर पुरुष के तौर पर लिया जाता है। संविधान निर्माण में अपनी अद्वितीय भूमिका के लिए उनका नाम भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। मौजूदा दौर में राजनीति के गलियारों में उनके नाम की गूँज पहले से कहीं अधिक तीव्र हो गई है। आज हर राजनीतिक दल ‘अंबेडकर हमारे हैं’ के नारे का सहारा ले रहा है।

Contents
“सियासत का ‘ब्लू प्रिंट’: आंबेडकर के नाम पर किसकी होगी जीत?”वोटों का गणित: 16% आबादी और सत्ता का संतुलनविरासत पर ‘कब्जे’ की जंगक्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व का संकट“मिशन 2027: नीले झंडे और लाल टोपी का संगम?

वोट बैंक की सियासत में बाबा साहेब आज सबसे बड़े केंद्र बिंदु हैं। राजनीतिक दल उनके नाम की ढाल बनाकर जनता के बीच जाते हैं और अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश करते हैं।

आज उनकी 134वीं जयंती है और देश के तमाम बड़े दलों को बाबा साहेब की विरासत की ‘खूब याद’ आ रही है। अगर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य की बात की जाए, तो कांग्रेस और बीजेपी से लेकर सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल भी अंबेडकरवादी एजेंडे को लेकर काफी सक्रिय नजर आते हैं।

भारतीय राजनीति के केंद्र में आज अगर कोई एक नाम सबसे ज्यादा गूंज रहा है, तो वह है ‘बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर’। सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता अब बिना ‘नीले झंडे’ और अंबेडकरवादी विचारों को अपनाए पूरा नहीं होता।

कोई उन्हें अपना ‘मसीहा’ बताता है, तो कोई उन्हें ‘राष्ट्रवाद’ का चेहरा बनाने की होड़ में लगा है। यह देखना दिलचस्प है कि कैसे अंबेडकरवादी राजनीति आज देश की सत्ता और चुनावी समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर रही है।

“सियासत का ‘ब्लू प्रिंट’: आंबेडकर के नाम पर किसकी होगी जीत?”

यूपी की गलियों से लेकर महाराष्ट्र के मैदानों तक, डॉ. अंबेडकर की विरासत को लेकर छिड़ी है एक बड़ी जंग। कौन है बाबा साहेब के सपनों का असली वारिस और कौन कर रहा है सिर्फ प्रतीकों की राजनीति? भारतीय राजनीति का चेहरा चाहे जो हो भगवा, तिरंगा या नीला लेकिन सत्ता की चाबी आज भी उसी दरवाजे से निकलती है जिसे बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने ‘संवैधानिक शक्ति’ से गढ़ा था। आज आलम यह है कि बीजेपी हो या कांग्रेस, सपा हो या बसपा, हर दल के लिए बाबा साहेब अब सिर्फ एक आदर्श नहीं, बल्कि एक बड़ी ‘राजनैतिक मजबूरी’ बन चुके हैं।

वोटों का गणित: 16% आबादी और सत्ता का संतुलन

देश में लगभग 16% दलित आबादी है, लेकिन उत्तर प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में यह आंकड़ा चुनावी नतीजों को पलटने का दम रखता है। हालिया लोकसभा चुनावों ने इस हकीकत पर मुहर लगा दी है। जिस तरह से ‘इंडिया ब्लॉक’ ने बीजेपी के विजय रथ को बहुमत से पहले रोका, उसमें दलित वोट बैंक की निर्णायक भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

विरासत पर ‘कब्जे’ की जंग

  • दलितों की इस ताकत को भांपते हुए अब बीजेपी और कांग्रेस के बीच बाबा साहेब की विरासत को अपनाने की होड़ मची है:
  • बीजेपी: आंबेडकर को राष्ट्रवाद और विकास के प्रतीकों (पंचतीर्थ) से जोड़कर अपनी पैठ बना रही है।
  • कांग्रेस: ‘संविधान बचाओ’ के नारे और सामाजिक न्याय के जरिए पुराने दलित वोट बैंक को वापस पाने की कोशिश में है।

क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व का संकट

इस खींचतान ने उन पार्टियों की नींद उड़ा दी है जिनकी राजनीति ही बाबा साहेब के नाम पर खड़ी है। मायावती (BSP) और प्रकाश आंबेडकर (VBA) जैसे नेता अब एक सुर में कांग्रेस और बीजेपी दोनों का विरोध कर रहे हैं। इनके लिए यह सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि अपने ‘कोर वोट बैंक’ को बचाने की लड़ाई है। उन्हें डर है कि अगर राष्ट्रीय दलों ने आंबेडकर के नाम पर सेंधमारी की, तो उनकी पहचान खतरे में पड़ सकती है।

“मिशन 2027: नीले झंडे और लाल टोपी का संगम?

2027 के विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी ने अपनी रणनीति साफ कर दी है। अखिलेश यादव अब बाबा साहेब के विचारों को केवल किताबों तक सीमित न रखकर उन्हें PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए धरातल पर उतार रहे हैं। आंबेडकर जयंती को ‘PDA दिवस’ के रूप में मनाना और बाबा साहेब के प्रपौत्र डॉ. राजरतन आंबेडकर को मंच पर साथ लाना, यह संकेत है कि सपा अब बसपा के कोर वोट बैंक में सीधी सेंधमारी के लिए तैयार है।

कुल मिलाकर, आज दलित पॉलिटिक्स किसी एक दल की बपौती नहीं रही। हर राजनीतिक खिलाड़ी डॉ. आंबेडकर के नाम का सहारा लेकर उस 16% आबादी के दिल में उतरना चाहता है। साफ़ है कि आने वाले समय में दिल्ली का रास्ता उसी दल के लिए खुलेगा, जो बाबा साहेब के विचारों और उनके अनुयायियों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर पाएगा।

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