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सीमेंट नहीं, खपरैल की छत पर क्यों था पुराने लोगों का भरोसा? इसके पीछे छिपी है बड़ी वैज्ञानिक वजह

vineet verma
Last updated: July 17, 2026 2:53 pm
vineet verma
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नई दिल्ली: आज भले ही कंक्रीट और आरसीसी की छतों का दौर हो, लेकिन कभी भारत के गांवों और कस्बों में अधिकांश घरों की पहचान खपरैल की छतें हुआ करती थीं। लाल या भूरे रंग की मिट्टी से बनी इन छतों को केवल परंपरा का हिस्सा नहीं माना जाता था, बल्कि इनके पीछे मौसम, लागत, टिकाऊपन और पर्यावरण से जुड़ी कई व्यावहारिक वजहें थीं। यही कारण था कि आधुनिक तकनीक के अभाव में भी ये छतें लोगों की पहली पसंद बनी रहीं। विशेषज्ञों के अनुसार, स्थानीय जलवायु के अनुरूप तैयार की जाने वाली खपरैल की छतें प्राकृतिक रूप से घर को आरामदायक बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती थीं।

खपरैल क्या होती है और कैसे बनती थी?
खपरैल मिट्टी से तैयार की जाने वाली विशेष प्रकार की पकी हुई टाइल होती है। इन्हें भट्ठे में पकाकर मजबूत बनाया जाता था और फिर बांस या लकड़ी के ढांचे पर एक-दूसरे के ऊपर चढ़ाकर बिछाया जाता था। इस तरह तैयार छत हल्की होने के साथ पर्याप्त मजबूत भी होती थी और लंबे समय तक उपयोग में रहती थी।

भीषण गर्मी में भी घर रहता था ठंडा
खपरैल की सबसे बड़ी खासियत उसका प्राकृतिक तापरोधी गुण था। मिट्टी की बनी टाइलें गर्मी को सीधे घर के अंदर नहीं पहुंचने देती थीं। साथ ही, टाइलों के बीच बनी छोटी-छोटी जगहों से गर्म हवा ऊपर उठकर बाहर निकल जाती थी, जिससे घर के अंदर स्वाभाविक वेंटिलेशन बना रहता था। यही वजह थी कि बिना एसी या कूलर के भी ऐसे घर अपेक्षाकृत ठंडे महसूस होते थे।

बारिश का पानी नहीं रुकता था
पुराने समय में सीमेंट और आधुनिक जलरोधी तकनीक उपलब्ध नहीं थीं। इसलिए खपरैल की छतों को ढलान के साथ बनाया जाता था। टाइलों की ओवरलैपिंग डिजाइन बारिश के पानी को तेजी से नीचे बहा देती थी, जिससे छत पर पानी जमा नहीं होता था और रिसाव की संभावना भी काफी कम हो जाती थी।

कम खर्च में तैयार हो जाती थी मजबूत छत
खपरैल स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मिट्टी से बनाई जाती थी और गांवों के कुम्हार इन्हें तैयार करते थे। इससे परिवहन और निर्माण की लागत कम रहती थी। स्थानीय संसाधनों के उपयोग के कारण यह ग्रामीण परिवारों के लिए आर्थिक रूप से भी बेहतर विकल्प माना जाता था।

पर्यावरण के अनुकूल निर्माण सामग्री
मिट्टी से बनी खपरैल प्राकृतिक सामग्री होती थी, इसलिए इसका पर्यावरण पर असर भी बेहद कम पड़ता था। आधुनिक कंक्रीट की तुलना में इसके निर्माण में कम ऊर्जा की जरूरत होती थी और उपयोग के बाद भी यह प्रकृति में आसानी से समाहित हो जाती थी।

रखरखाव आसान, मरम्मत भी सस्ती
अगर किसी कारण एक-दो खपरैल टूट जाती थीं, तो पूरी छत बदलने की जरूरत नहीं पड़ती थी। केवल खराब टाइल हटाकर नई खपरैल लगा दी जाती थी। इससे रखरखाव का खर्च काफी कम रहता था और छत वर्षों तक सुरक्षित बनी रहती थी।

आग और शोर से भी मिलता था बचाव
भट्ठे में उच्च तापमान पर पकाई जाने वाली मिट्टी की खपरैल आसानी से आग नहीं पकड़ती थी। इसके अलावा मिट्टी की संरचना बारिश, ओलावृष्टि और तेज हवा से होने वाले शोर को काफी हद तक कम कर देती थी, जिससे घर के भीतर अपेक्षाकृत शांत वातावरण बना रहता था।

आज क्यों कम हो गई हैं खपरैल की छतें?
शहरीकरण, आरसीसी निर्माण तकनीक के बढ़ते उपयोग, बहुमंजिला इमारतों और कम रखरखाव वाली आधुनिक छतों के कारण खपरैल का इस्तेमाल लगातार घटा है। हालांकि आज भी देश के कई ग्रामीण इलाकों और पारंपरिक वास्तुकला में खपरैल की छतों का उपयोग देखने को मिलता है। पर्यावरण अनुकूल निर्माण और ऊर्जा बचत की बढ़ती चर्चा के बीच एक बार फिर ऐसी पारंपरिक तकनीकों की उपयोगिता पर ध्यान दिया जा रहा है।

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