नई दिल्ली: पेरिस ओलंपिक की दोहरी पदक विजेता निशानेबाज मनु भाकर ने सोशल मीडिया पर बढ़ती अभद्र भाषा और गाली-गलौज की संस्कृति पर चिंता जताई है। उन्होंने युवाओं से अपील करते हुए कहा कि किसी भी तरह की अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कभी भी ‘कूल’ नहीं हो सकता। उनके मुताबिक, किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके शब्दों, व्यवहार और संस्कार से होती है।
मनु भाकर ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किए गए एक वीडियो संदेश में कहा कि मेहनत, ईमानदारी, दूसरों के प्रति सम्मान और अपने माता-पिता व देश का नाम रोशन करना ही वास्तविक अर्थों में ‘कूल’ होने की पहचान है। हालांकि उन्होंने किसी विशेष घटना का जिक्र नहीं किया, लेकिन रोजमर्रा की बातचीत में गाली-गलौज के बढ़ते चलन पर चिंता जरूर जताई।
वीडियो के जरिए साझा किया दिल की बात
वीडियो संदेश की शुरुआत में मनु भाकर ने कहा कि वह दिल से निकली एक बात लोगों के साथ साझा करना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को यह वीडियो लंबा लग सकता है, लेकिन यदि वे दो से तीन मिनट निकालकर इसे खुले मन से सुनेंगे तो उनकी बात पर जरूर विचार करेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी का नजरिया अलग है या वह अपनी राय रखना चाहता है तो वह कमेंट के माध्यम से अपनी बात साझा कर सकता है। उनके अनुसार, स्वस्थ चर्चा और अलग-अलग विचारों का हमेशा स्वागत होना चाहिए।
‘भाषा ही व्यक्तित्व का आईना होती है’
मनु भाकर ने कहा कि किसी भी इंसान की भाषा उसके व्यक्तित्व का आईना होती है। उन्होंने लोगों से अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करने की अपील करते हुए कहा कि समय के साथ व्यक्ति वही बनता है, जैसा वह सोचता है, बोलता है और अपने जीवन में अपनाता है। इसलिए खराब भाषा या गाली-गलौज को किसी भी रूप में सामान्य या आकर्षक नहीं माना जाना चाहिए।
‘मेहनत और सम्मान ही असली कूलनेस’
अपने संदेश में मनु भाकर ने कहा कि बुरी भाषा का इस्तेमाल करना या गाली देना कभी भी ‘कूल’ नहीं है। उन्होंने कहा कि मेहनती होना, दयालु होना, दूसरों और स्वयं के प्रति सम्मान रखना, ईमानदारी से सफलता हासिल करने का प्रयास करना और अपने माता-पिता व देश का नाम रोशन करना ही वास्तविक ‘कूलनेस’ है।
बदलती सोच पर जताई चिंता
मनु भाकर ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में समाज में गाली-गलौज को लेकर लोगों की सोच बदलती दिखाई दे रही है। उनके मुताबिक, कई लोगों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल सामान्य बात बन गया है और इसे आधुनिक या ‘कूल’ होने की निशानी समझा जाने लगा है। उन्होंने कहा कि रोजमर्रा की बातचीत में बिना सोचे-समझे ऐसे शब्दों का प्रयोग बढ़ रहा है, जिस पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है।