नई दिल्ली: पति की मौत के बाद एक महिला को ऐसी जगह जिंदगी गुजारनी पड़ रही थी, जहां न टॉयलेट था और न ही बाथरूम। पूर्वी दिल्ली में प्रॉपर्टी विवाद के चलते वह करीब तीन महीने तक एक गैराज में रहने को मजबूर रही। वहां उसके पास एक सोफा, सिंगल बेड और फ्रिज तक था, लेकिन बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए महिला की सास को परिवार के घर में उसे रहने के लिए जगह देने का निर्देश दिया है।
अदालत ने साफ कहा कि जब तक महिला के साझा घर में रहने के अधिकार पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक उसे बेघर नहीं छोड़ा जा सकता। जस्टिस सचिन दत्ता महिला की उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें उसने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत अंतरिम निवास की मांग वाली अर्जी खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।
महिला ने त्रिलोकपुरी स्थित उस मकान में रहने का अधिकार मांगा था, जहां उसके मुताबिक वह अपने दिवंगत पति राजू के साथ रहती थी। उसकी सास इसी मकान के ग्राउंड फ्लोर पर रहती थी।
सास को घर में जगह देने का आदेश क्यों देना पड़ा?
हाईकोर्ट ने 27 अक्टूबर को अपने आदेश में कहा कि आवेदन पर फैसला आने तक महिला को बिना छत के नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत के मुताबिक, सास को उसके आदेशों का उल्लंघन करने का लाभ उठाकर महिला के साझा घर में रहने के दावे को खत्म करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि मकान का कम से कम एक फ्लोर सास के कब्जे में है।
यह विवाद साल 2022 में शुरू हुआ था। उस समय महिला और उसका पति मकान की चौथी मंजिल पर रहते थे। इसी दौरान सास ने मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन्स एक्ट, 2007 के तहत अधिकारियों से संपर्क कर दोनों को घर से बाहर निकालने की मांग की थी।
शुरुआत में बेदखली का आदेश भी जारी हुआ, लेकिन अपील के दौरान इसे रद्द कर दिया गया। अधिकारियों ने पाया था कि महिला का पति उस संपत्ति का सह-मालिक था।
सास पर बिजली सप्लाई काटने का आरोप
महिला ने आरोप लगाया कि 13 अगस्त, 2022 को उसकी सास ने मकान की चौथी मंजिल की बिजली सप्लाई बंद कर दी थी। इसके बाद उसे अपने पति के साथ घर छोड़ना पड़ा। बिजली-पानी की सुविधा बहाल कराने और बेदखली से बचने के लिए उसके पति ने सिविल कोर्ट का रुख किया था, लेकिन उसकी अर्जी और बाद में दायर अपील खारिज हो गई थी।
हाईकोर्ट ने इस मामले में कहा कि महिला उन पुरानी कानूनी कार्यवाहियों में पक्षकार नहीं थी। इसलिए उन मामलों में दिए गए आदेश उसके स्वतंत्र आवास अधिकार का फैसला नहीं कर सकते थे।
16 नवंबर, 2024 को पति की मौत के बाद महिला को उसके सिविल मुकदमे में शामिल किया गया। हालांकि, 28 मई, 2025 को यह मामला वापस ले लिया गया। वहीं, महिला की सास ने भी 7 अगस्त, 2025 को अपना केस वापस ले लिया था।
हाईकोर्ट ने 8 फरवरी, 2024 और 7 जनवरी, 2025 के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें महिला की अंतरिम आवास संबंधी अर्जी खारिज की गई थी। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि दंपति के खिलाफ जारी बेदखली आदेश को डिविजनल कमिश्नर ने 17 मार्च, 2023 को ही निरस्त कर दिया था।
घरेलू हिंसा कानून के तहत महिला को क्या अधिकार?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के तहत कोई महिला अपने पति की महिला रिश्तेदारों के खिलाफ भी शिकायत कर सकती है। इसके साथ ही साझा घर में रहने के अधिकार के लिए यह जरूरी नहीं है कि उस संपत्ति का मालिकाना हक पति के नाम पर ही हो।
अदालत ने 18 नवंबर, 2023 की घरेलू घटना रिपोर्ट का भी जिक्र किया। इसमें आरोप लगाया गया था कि पानी और बिजली की सप्लाई काटने के बाद महिला को जबरन घर से बाहर कर दिया गया था। हाईकोर्ट के मुताबिक, पहले की कार्यवाही में इस रिपोर्ट पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया।
गैराज में मिली थीं रहने की बदहाल परिस्थितियां
हाईकोर्ट ने 23 मई, 2025 को तैयार प्रोटेक्शन ऑफिसर की रिपोर्ट पर भी गौर किया। रिपोर्ट के मुताबिक, महिला करीब तीन महीने से एक गैराज में रह रही थी। 22 मई को जब अधिकारी ने वहां का दौरा किया, तो कमरे में एक सोफा, सिंगल बेड, फ्रिज और कुछ बर्तन मिले।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि सोफा, बेड और फ्रिज गैराज मालिक के थे। वहां महिला के इस्तेमाल के लिए टॉयलेट या बाथरूम तक की सुविधा नहीं थी। अधिकारी ने उसके रहने की परिस्थितियों को बेहद खराब बताया था।
अदालत को यह भी बताया गया कि 22 मई और 24 सितंबर, 2025 को जारी अंतरिम आदेशों के बावजूद मकान की चौथी मंजिल बेच दी गई थी। इन आदेशों में संपत्ति को मौजूदा स्थिति में बनाए रखने और तीसरे पक्ष के अधिकार पैदा करने पर रोक लगाई गई थी।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सास को अदालत के आदेशों की अनदेखी कर महिला के साझा घर में रहने के दावे को कमजोर करने की छूट नहीं दी जा सकती।
महिला को एक सप्ताह के भीतर मिलेगा घर में रहने का स्थान
अंतरिम राहत देते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि महिला को 28 अक्टूबर से एक सप्ताह के भीतर मकान के किसी एक फ्लोर पर रहने की जगह उपलब्ध कराई जाए। त्रिलोकपुरी थाने के एसएचओ को संपत्ति का दौरा कर यह सुनिश्चित करने को कहा गया कि महिला को रहने के लिए उचित हिस्सा मिले।
अदालत ने सास को महिला के आने-जाने, वहां रहने और बुनियादी सुविधाओं के इस्तेमाल में किसी तरह की बाधा डालने से भी रोक दिया है। यदि महिला को कोई परेशानी होती है तो पुलिस को उसकी सहायता करनी होगी।
एसएचओ को मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने अनुपालन रिपोर्ट भी पेश करनी होगी। इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि महिला को मकान का कौन-सा हिस्सा रहने के लिए दिया गया है। अदालत ने उसे संपत्ति में मौजूद बिजली कनेक्शन का इस्तेमाल करने की अनुमति भी दी है।
हाईकोर्ट ने महिला की अंतरिम आवास संबंधी अर्जी को आगे विचार के लिए मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के पास वापस भेज दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल दिया गया यह इंतजाम मजिस्ट्रेट के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा। साथ ही, हाईकोर्ट की टिप्पणियों को मामले के अंतिम गुण-दोष पर फैसला नहीं माना जाएगा।