एक साल से अधिक समय से चल रही खींचतान, बैठकों का लंबा दौर और दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों के बीच अटका व्यापारिक गतिरोध—अब आखिरकार अपनी अंतिम मंजिल के बेहद करीब पहुंचता दिख रहा है। भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील को लेकर एक ऐसा बड़ा मोड़ आया है, जिसने वैश्विक बाजार की सांसें थाम दी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से लेकर विदेश मंत्री मार्को रुबियो तक के बयानों से यह साफ हो गया है कि दोनों देशों के बीच जारी मतभेद अब सुलझने की कगार पर हैं और कुछ ही हफ्तों में एक ऐतिहासिक समझौते पर मुहर लग सकती है।
समझौता बेहद करीब, अलग रूप में आ सकती है डील
व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भारत के साथ जारी बातचीत पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “वे समझौता करना चाहते हैं। हम समझौता करेंगे। हां, हम काफी करीब हैं।” ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि यह डील पहले की तुलना में काफी अलग तरह की हो सकती है।
हालांकि उन्होंने इसके स्वरूप में होने वाले बदलावों को लेकर कोई खुलासा नहीं किया। वहीं, भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी पुष्टि की है कि बड़े मुद्दों पर काम पूरा हो चुका है और दोनों पक्ष सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दिया बड़ा बयान
भारत की दो दिवसीय यात्रा पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने नेटवर्क18 के प्रधान संपादक राहुल जोशी को दिए विशेष साक्षात्कार में भरोसा जताया कि यह समझौता अब महीनों का नहीं बल्कि कुछ ही हफ्तों का मामला है। उन्होंने बताया कि बातचीत अब केवल तकनीकी बारीकियों पर केंद्रित है।
सबसे महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि समझौते की प्रत्येक शर्त की भाषा दोनों देशों के लिए एक समान अर्थ रखे। रुबियो ने यह भी साफ किया कि समझौते पर सीधी बातचीत अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) संभाल रहे हैं, लेकिन वे खुद इस प्रक्रिया पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।
भारत को मिल सकती हैं बेहतर टैरिफ दरें
क्या भारत को अन्य देशों की तुलना में अधिक अनुकूल टैरिफ दरें मिलेंगी? इस सवाल पर मार्को रुबियो ने कहा कि किसी भी व्यापार समझौते का मुख्य उद्देश्य मौजूदा दरों और व्यवस्था से बेहतर शर्तें हासिल करना होता है।
उन्होंने माना कि हर देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है, लेकिन भारत और अमेरिका की गहरी मित्रता, सहयोग और कई साझा हित ऐसे मजबूत स्तंभ हैं जो मतभेदों को आसानी से दूर कर सकते हैं। यह समझौता दोनों देशों के आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर ही अंतिम रूप लिया जा रहा है।