मथुरा: सनातन धर्म की मान्यताओं में चार युगों का वर्णन मिलता है—सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग। मान्यता है कि द्वापर युग के समाप्त होने और भगवान श्रीकृष्ण के देह त्याग के साथ ही कलियुग का आरंभ हुआ था। श्रीकृष्ण की धरती पर आखिरी लीला से जुड़ी इसी घटना को कलियुग के प्रारंभ का आधार माना जाता है। कुछ पंचांगों और ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, 2026 में कलियुग दिवस से जुड़ी तिथि 8 अक्टूबर को मानी जा रही है।
श्रीकृष्ण के देह त्याग के बाद शुरू हुआ कलियुग
धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। बाल्यकाल से लेकर महाभारत और फिर यादव वंश के अंत तक उनकी जीवन लीला का वर्णन मिलता है।
मान्यता है कि जीवन की अंतिम लीला में भगवान श्रीकृष्ण एक पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे। इसी दौरान एक बहेलिए का तीर उनके पैर के तलवे में लगा। इसके बाद श्रीकृष्ण ने देह त्याग किया और बैकुंठ धाम लौट गए। धार्मिक मान्यताओं में श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के बाद ही कलियुग की शुरुआत मानी जाती है।
8 अक्टूबर को क्यों खास मानी जा रही है यह तिथि?
कुछ पंचांगों में श्रीकृष्ण के देह त्याग से जुड़ी घटना को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के आसपास बताया गया है। इसी आधार पर 2026 में 8 अक्टूबर की तिथि को कलियुग दिवस से जोड़ा जा रहा है।
धार्मिक मान्यताओं में यह दिन आत्मिक शुद्धि और भगवान के स्मरण के लिए विशेष माना जाता है। मान्यता है कि कलियुग में सच्चे मन से भगवान का नाम लेने का महत्व बहुत अधिक है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस युग में भगवान के नाम का स्मरण करने से वह पुण्य प्राप्त हो सकता है, जो सतयुग में हजारों वर्षों की तपस्या से मिलता था।
कलियुग दिवस पर क्या करना शुभ माना जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलियुग दिवस पर भगवान का स्मरण, ध्यान और हरि नाम का जाप करना शुभ माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर सकते हैं और हरि संकीर्तन कर सकते हैं।
दिए गए पंचांग के अनुसार, भगवान के स्मरण और चिंतन के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:39 बजे से 6:18 बजे तक बताया गया है। वहीं शाम को हरि संकीर्तन के लिए शाम 5:58 बजे से रात 8:30 बजे तक का समय बताया गया है।
धार्मिक मान्यताओं में केवल इस विशेष तिथि पर ही नहीं, बल्कि हर दिन भगवान के नाम का स्मरण करने को भी महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि प्रभु का निरंतर स्मरण व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से ईश्वर के करीब ले जाता है।