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यूपी 2027 से पहले दलित सियासत में नई एंट्री की आहट, रोहिणी घावरी के वाल्मीकि दांव से किसकी बढ़ेगी टेंशन?

news desk
Last updated: September 14, 2026 11:57 am
news desk
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स्विट्जरलैंड से भारत लौटने के बाद रोहिणी घावरी की यूपी में राजनीतिक सक्रियता की चर्चा तेज है। पश्चिमी यूपी से लेकर लखनऊ और कानपुर तक वाल्मीकि समाज को लामबंद करने की रणनीति की अटकलें हैं। अगर यह अभियान जमीन पर असरदार होता है तो 2027 में BSP के साथ-साथ सपा और आजाद समाज पार्टी के समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं।

Contents
2027 से पहले दलित राजनीति में नया समीकरण?पश्चिमी यूपी की 21 सीटों पर नजर?वाल्मीकि समाज से मुख्यमंत्री बनाने का नाराअखिलेश यादव से मुलाकात की भी चर्चाचंद्रशेखर आजाद से टकराव ने भी बढ़ाई चर्चाक्या चंद्रशेखर आजाद के लिए बनेंगी चुनौती?BSP के जाटव आधार से अलग वाल्मीकि राजनीति?

2027 से पहले दलित राजनीति में नया समीकरण?

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच दलित राजनीति में एक नया सियासी एंगल सामने आता दिखाई दे रहा है। स्विट्जरलैंड से भारत लौटने के बाद रोहिणी घावरी की यूपी की राजनीति में सक्रिय होने की चर्चाओं ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। उनकी संभावित राजनीति का केंद्र वाल्मीकि समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बताया जा रहा है।

रोहिणी घावरी लंबे समय से वाल्मीकि समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी का मुद्दा उठाती रही हैं। उनका तर्क है कि समाज को लंबे समय तक सफाईकर्मी की पहचान तक सीमित रखा गया, जबकि सत्ता और राजनीति में उसे पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला।

अब इसी मुद्दे को आधार बनाकर वाल्मीकि समाज को एक अलग राजनीतिक ताकत के रूप में संगठित करने की कोशिश की चर्चा है।

पश्चिमी यूपी की 21 सीटों पर नजर?

सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं के मुताबिक, रोहिणी घावरी की सक्रियता पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर देखने को मिल सकती है। इनमें आगरा कैंट, एत्मादपुर, जसराना, फिरोजाबाद, मेरठ कैंट, मेरठ शहर, गाजियाबाद, लोनी, अलीगढ़ और खैर जैसी सीटों के नाम सामने आ रहे हैं।

इसके अलावा लखनऊ की लखनऊ मध्य, लखनऊ उत्तर और लखनऊ पश्चिम तथा कानपुर की सीसामऊ, आर्यनगर और किदवईनगर सीटों पर भी वाल्मीकि समाज के बीच संपर्क बढ़ाने की चर्चा है।

इन इलाकों में दलित मतदाताओं की चुनावी भूमिका अहम मानी जाती है। ऐसे में वाल्मीकि समाज के अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा 2027 की चुनावी राजनीति में नया मोड़ दे सकता है।

वाल्मीकि समाज से मुख्यमंत्री बनाने का नारा

रोहिणी घावरी की राजनीति का एक अहम दावा वाल्मीकि समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने से जुड़ा है। वह वाल्मीकि समाज से मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात भी सामने रखती रही हैं।

अगर वह इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर वाल्मीकि मतदाताओं के बीच ले जाने में कामयाब होती हैं तो यूपी की मौजूदा दलित राजनीति में एक नया सामाजिक समीकरण बन सकता है।

फिलहाल यह देखना अहम होगा कि उनकी सक्रियता सिर्फ सामाजिक अभियान तक सीमित रहती है या 2027 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए इसका कोई औपचारिक राजनीतिक स्वरूप भी सामने आता है।

अखिलेश यादव से मुलाकात की भी चर्चा

रोहिणी घावरी के 14 और 15 सितंबर को लखनऊ पहुंचने की चर्चा है। इस दौरान वाल्मीकि समाज के लोगों के साथ बैठक और मुलाकात की संभावना जताई जा रही है।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से उनकी मुलाकात की अटकलें भी हैं। रोहिणी का दावा है कि चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ उनकी लड़ाई में अखिलेश यादव ने उन्हें समर्थन का भरोसा दिया है।

हालांकि, अखिलेश यादव से प्रस्तावित मुलाकात या समर्थन को लेकर समाजवादी पार्टी की ओर से आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।

चंद्रशेखर आजाद से टकराव ने भी बढ़ाई चर्चा

रोहिणी घावरी पिछले कुछ समय से नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद पर लगाए गए अपने आरोपों को लेकर भी चर्चा में रही हैं।

उन्होंने चंद्रशेखर आजाद पर शादी का वादा कर शोषण करने का आरोप लगाया है। रोहिणी का दावा है कि सांसद बनने के बाद चंद्रशेखर आजाद ने उनसे दूरी बना ली। उन्होंने शिकायत के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं किए जाने का आरोप भी लगाया है।

हालांकि, इन आरोपों पर चंद्रशेखर आजाद का पक्ष इस खबर में उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन दावों को रोहिणी घावरी के आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

क्या चंद्रशेखर आजाद के लिए बनेंगी चुनौती?

रोहिणी घावरी की संभावित राजनीतिक सक्रियता का सबसे दिलचस्प पहलू पश्चिमी यूपी है। यही वह क्षेत्र है जहां चंद्रशेखर आजाद और उनकी आजाद समाज पार्टी ने दलित युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ बनाने की कोशिश की है।

ऐसे में अगर रोहिणी वाल्मीकि समाज के बीच अपना अलग जनाधार तैयार करने में सफल होती हैं तो इसका असर सिर्फ बहुजन समाज पार्टी तक सीमित नहीं रहेगा। आजाद समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के दलित वोट समीकरण पर भी इसका असर पड़ सकता है।

BSP के जाटव आधार से अलग वाल्मीकि राजनीति?

यूपी की दलित राजनीति में लंबे समय से जाटव समुदाय को सबसे प्रभावशाली सामाजिक आधार माना जाता रहा है और मायावती की BSP इस आधार की प्रमुख राजनीतिक ताकत रही है।

वहीं, पिछले कुछ वर्षों में चंद्रशेखर आजाद ने दलित युवाओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है। अब वाल्मीकि समाज को केंद्र में रखकर रोहिणी घावरी की संभावित सक्रियता दलित राजनीति के भीतर एक नए सामाजिक ध्रुवीकरण की संभावना पैदा कर रही है।

हालांकि, इसे अभी किसी नए राजनीतिक मोर्चे या संगठन की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी। असली तस्वीर तभी साफ होगी जब रोहिणी की गतिविधियां जमीन पर कितनी व्यापक होती हैं और उन्हें राजनीतिक या संगठनात्मक स्तर पर किसका समर्थन मिलता है।

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