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अमेरिका के लगातार हमलों के बाद भी क्यों नहीं टूटा ईरान? वेनेजुएला जैसी रणनीति यहां क्यों हुई बेअसर, समझिए पूरी कहानी

vineet verma
Last updated: July 21, 2026 10:07 am
vineet verma
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नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध ने वैश्विक राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। लगातार सैन्य हमलों और आर्थिक दबाव के बावजूद ईरान अब भी मजबूती से डटा हुआ है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर वह कौन-सी वजहें हैं, जिनके चलते ईरान वेनेजुएला की तरह नहीं टूटा और अमेरिका की रणनीति अब तक निर्णायक परिणाम नहीं दे सकी।

Contents
अमेरिका की उम्मीदों के उलट डटा रहा ईरानसुप्रीम लीडर की मौत के बाद भी नहीं डगमगाया सत्ता तंत्रवेनेजुएला और ईरान में सबसे बड़ा अंतर क्या रहा?प्रतिबंधों के बीच भी जारी रहा तेल कारोबारसमानांतर सैन्य ढांचे ने बढ़ाई ताकतड्रोन और मिसाइल क्षमता बनी बड़ी ताकतआर्थिक दबाव के बजाय बढ़ा राष्ट्रीय एकजुटता का माहौलजमीन पर नहीं उतरा अमेरिका, हवाई हमलों तक सीमित रही रणनीतिअब भी जारी है युद्ध और बातचीत दोनों

अमेरिका की उम्मीदों के उलट डटा रहा ईरान

अमेरिका को उम्मीद थी कि लगातार हवाई हमलों, आर्थिक प्रतिबंधों और बढ़ते दबाव के बीच ईरान की अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी। साथ ही जनता सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आएगी और शासन की पकड़ ढीली पड़ जाएगी। लेकिन अब तक हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। युद्ध जारी रहने के बावजूद ईरान जवाबी कार्रवाई भी कर रहा है और उसके सत्ता तंत्र में किसी बड़ी टूट के संकेत नहीं मिले हैं।

सुप्रीम लीडर की मौत के बाद भी नहीं डगमगाया सत्ता तंत्र

युद्ध के दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके परिवार के कुछ सदस्यों के मारे जाने के बावजूद शासन व्यवस्था प्रभावित होती नहीं दिखी। अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी को सत्ता के प्रति जनसमर्थन का संकेत माना जा रहा है। वहीं अमेरिका की यह उम्मीद भी पूरी नहीं हुई कि जनता सरकार के खिलाफ खुलकर खड़ी होगी।

वेनेजुएला और ईरान में सबसे बड़ा अंतर क्या रहा?

वेनेजुएला में अमेरिकी दबाव के बाद तेल कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ था, जिससे अर्थव्यवस्था चरमरा गई और सत्ता के भीतर भी मतभेद सामने आ गए। इसके विपरीत ईरान कई वर्षों से ऐसे हालात के लिए तैयारी करता रहा। प्रतिबंधों के बावजूद उसने तेल निर्यात पूरी तरह बंद नहीं होने दिया और वैकल्पिक तरीकों से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक अपनी पहुंच बनाए रखी।

प्रतिबंधों के बीच भी जारी रहा तेल कारोबार

अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने कथित तौर पर ऐसे जहाजों का इस्तेमाल किया, जो ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर समुद्र में ही तेल का हस्तांतरण करते रहे। सस्ते दामों पर तेल की बिक्री और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था के जरिए निर्यात जारी रहने से अर्थव्यवस्था पूरी तरह नहीं टूटी और राजस्व का प्रवाह बना रहा।

समानांतर सैन्य ढांचे ने बढ़ाई ताकत

ईरान ने वर्षों में नियमित सेना के साथ-साथ इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) का समानांतर सैन्य ढांचा भी मजबूत किया। युद्ध के दौरान दोनों संरचनाएं एक साथ सक्रिय रहीं। इससे सैन्य क्षमता बरकरार रही और जवाबी कार्रवाई जारी रखने में मदद मिली।

ड्रोन और मिसाइल क्षमता बनी बड़ी ताकत

युद्ध के दौरान ईरान लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों की क्षमता दिखाता रहा। अमेरिका के हमलों के जवाब में उसने बहरीन, कुवैत और अन्य क्षेत्रों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने का दावा भी किया। इससे यह संकेत मिला कि सैन्य संसाधनों का बड़ा हिस्सा अब भी सक्रिय है।

आर्थिक दबाव के बजाय बढ़ा राष्ट्रीय एकजुटता का माहौल

रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों को राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ अभियान के रूप में पेश किया। यही वजह रही कि युद्ध शुरू होने के बाद सत्ता विरोधी माहौल बनने के बजाय बड़ी संख्या में लोग सरकार के समर्थन में दिखाई दिए। इससे अमेरिका की वह रणनीति कमजोर पड़ती दिखी, जिसमें आर्थिक दबाव के जरिए आंतरिक असंतोष बढ़ने की उम्मीद की जा रही थी।

जमीन पर नहीं उतरा अमेरिका, हवाई हमलों तक सीमित रही रणनीति

अब तक अमेरिका की सैन्य कार्रवाई मुख्य रूप से हवाई हमलों तक सीमित रही है। दूसरी ओर ईरान मिसाइलों और ड्रोन के जरिए जवाब देता रहा। ऐसे में युद्ध का स्वरूप लगातार हवाई और लंबी दूरी के हमलों तक सीमित बना हुआ है।

अब भी जारी है युद्ध और बातचीत दोनों

मौजूदा हालात में एक तरफ सैन्य कार्रवाई जारी है तो दूसरी ओर बातचीत की संभावनाएं भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। हालांकि अब तक ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं कि ईरान की शासन व्यवस्था या अर्थव्यवस्था पूरी तरह ढहने की स्थिति में पहुंच गई हो।

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