नई दिल्ली: भारत के आम दुनियाभर में अपनी मिठास और स्वाद के लिए मशहूर हैं। अल्फांसो, दशहरी, लंगड़ा और केसर जैसी किस्मों की विदेशों में भारी मांग रहती है। इसके बावजूद कई बार करोड़ों रुपये की आम की खेप विदेशी बंदरगाहों पर रोक दी जाती है। कभी जापान आयात पर रोक लगा देता है तो कभी यूरोपीय देशों में भारतीय आमों की एंट्री बंद हो जाती है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण फाइटोसैनिटरी नियमों का पालन न होना माना जाता है।
हाल ही में जापान द्वारा भारतीय आमों के आयात पर लगाई गई रोक के बाद यह शब्द फिर चर्चा में आ गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर फाइटोसैनिटरी क्या है और यह आम के निर्यात में इतनी बड़ी भूमिका क्यों निभाता है?
क्या होता है फाइटोसैनिटरी?
फाइटोसैनिटरी शब्द दो ग्रीक शब्दों से मिलकर बना है। इसमें ‘फाइटो’ का अर्थ पौधा और ‘सैनिटरी’ का अर्थ स्वच्छता होता है। यानी पौधों और कृषि उत्पादों की सुरक्षा और स्वच्छता से जुड़े नियम।
इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि किसी देश से दूसरे देश भेजे जाने वाले फल, सब्जियां, पौधे या बीज किसी खतरनाक कीट, बीमारी, फफूंद या जीवाणु को अपने साथ लेकर न जाएं। यदि ऐसा होता है तो आयात करने वाले देश की कृषि व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
कौन तय करता है ये नियम?
दुनियाभर में फाइटोसैनिटरी मानकों की निगरानी और नियमों के पालन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएं काम करती हैं। इनका मकसद कृषि व्यापार को सुरक्षित बनाए रखना और देशों को विदेशी कीटों एवं बीमारियों से बचाना होता है।
इसी वजह से किसी भी कृषि उत्पाद के निर्यात से पहले उसकी सख्त जांच की जाती है। यह प्रक्रिया ठीक उसी तरह होती है जैसे हवाई अड्डों पर यात्रियों की सुरक्षा जांच की जाती है।
आम की सबसे ज्यादा जांच क्यों होती है?
आम दुनिया के सबसे संवेदनशील कृषि निर्यात उत्पादों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह फ्रूट फ्लाई यानी फल मक्खी का खतरा है।
यह मक्खी आम के छिलके में अंडे दे सकती है। बाद में उनसे निकलने वाले लार्वा फल के अंदर ही विकसित हो जाते हैं। बाहर से फल पूरी तरह सामान्य दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर कीट मौजूद हो सकते हैं।
इसके अलावा फफूंद, बैक्टीरिया और अन्य क्वारंटीन कीट भी कई देशों के लिए चिंता का विषय होते हैं। यही कारण है कि कई देश ऐसे मामलों में लगभग शून्य सहनशीलता की नीति अपनाते हैं।
विदेश भेजने से पहले आम पर क्या-क्या प्रक्रिया होती है?
भारत से आम का निर्यात केवल पैकिंग करके नहीं किया जाता। इसके लिए कई चरणों वाली प्रक्रिया अपनाई जाती है।
सबसे पहले बागों की निगरानी और फलों का निरीक्षण किया जाता है। इसके बाद आयातक देश के नियमों के अनुसार विशेष उपचार किए जाते हैं।
कुछ देशों के लिए हॉट वॉटर ट्रीटमेंट अनिवार्य होता है, जिसमें आमों को निर्धारित तापमान वाले गर्म पानी में रखा जाता है। वहीं कई देशों के लिए वेपर हीट ट्रीटमेंट जरूरी होता है, जिसमें नियंत्रित तापमान की भाप से संभावित कीटों को खत्म किया जाता है।
कुछ मामलों में विकिरण आधारित प्रक्रिया भी अपनाई जाती है। सभी परीक्षणों और उपचारों के बाद फाइटोसैनिटरी प्रमाणपत्र जारी किया जाता है, जो यह प्रमाणित करता है कि खेप आयातक देश के नियमों के अनुरूप है।
जापान ने भारतीय आमों पर रोक क्यों लगाई?
जापान दुनिया के सबसे सख्त कृषि आयात नियमों वाले देशों में शामिल है। हाल ही में जापान ने भारतीय आमों के आयात पर रोक लगा दी।
रिपोर्टों के अनुसार, चिंता का मुख्य कारण वेपर हीट ट्रीटमेंट प्रक्रिया के मानकों का सही तरीके से पालन न होना बताया गया। जापान ने गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को लेकर आशंका जताई, जिसके बाद भारत ने मामले की जांच शुरू की और दोनों देशों के बीच तकनीकी स्तर पर बातचीत भी शुरू हो गई।
2014 में यूरोप ने भी लगाया था प्रतिबंध
भारतीय आमों पर सबसे चर्चित प्रतिबंध वर्ष 2014 में लगा था, जब यूरोपीय संघ ने अल्फांसो आम और कुछ अन्य कृषि उत्पादों के आयात पर अस्थायी रोक लगा दी थी।
उस समय कुछ खेपों में फल मक्खी और अन्य पौध-कीट पाए गए थे। इसके बाद भारत ने निरीक्षण और परीक्षण व्यवस्था को और मजबूत किया, जिसके बाद यूरोपीय संघ ने प्रतिबंध हटा लिया।
अमेरिका में भी कई बार भारतीय आमों की खेप नियमों से जुड़ी खामियों के कारण फंस चुकी है। कुछ मामलों में खेपों को नष्ट तक करना पड़ा, जिससे निर्यातकों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ।
क्या सिर्फ भारत के साथ ही होती है सख्ती?
ऐसा नहीं है कि केवल भारत के कृषि उत्पादों पर ही कड़ी जांच होती है। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जापान, न्यूजीलैंड और यूरोपीय देश भी एक-दूसरे के कृषि उत्पादों पर समय-समय पर अतिरिक्त जांच या प्रतिबंध लगाते रहते हैं।
दरअसल, हर देश अपनी कृषि व्यवस्था को बाहरी कीटों और बीमारियों से बचाने के लिए सख्त फाइटोसैनिटरी मानकों का पालन करता है।
भारत क्या कदम उठा रहा है?
भारतीय एजेंसियां अब निर्यात प्रक्रिया को और मजबूत बनाने पर काम कर रही हैं। इसके तहत ट्रेसबिलिटी सिस्टम को बेहतर बनाया जा रहा है ताकि किसी भी खेप को उसके मूल बाग तक ट्रैक किया जा सके।
इसके अलावा निरीक्षण केंद्रों का आधुनिकीकरण, उपचार सुविधाओं का विस्तार और फ्रूट फ्लाई नियंत्रण कार्यक्रमों को भी मजबूत किया जा रहा है। साथ ही आयातक देशों के साथ तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि भारतीय आमों का निर्यात बिना किसी बाधा के जारी रह सके।