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Reading: ऑक्टोपस से सीखी ‘स्मार्टनेस’, अब बिना दिमाग के फैसले ले रहा यह रोबोट! समंदर में करेगा बड़े-बड़े काम
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Indian Press House > Blog > Latest News > ऑक्टोपस से सीखी ‘स्मार्टनेस’, अब बिना दिमाग के फैसले ले रहा यह रोबोट! समंदर में करेगा बड़े-बड़े काम
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ऑक्टोपस से सीखी ‘स्मार्टनेस’, अब बिना दिमाग के फैसले ले रहा यह रोबोट! समंदर में करेगा बड़े-बड़े काम

vineet verma
Last updated: June 12, 2026 6:20 am
vineet verma
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नई दिल्ली: वैज्ञानिकों ने एक ऐसा रोबोटिक आर्म विकसित किया है, जो बिना किसी बड़े कंट्रोल सिस्टम या केंद्रीय कंप्यूटर के अपने आसपास की चीजों को महसूस कर सकता है, उन्हें पकड़ सकता है और खुद निर्णय लेकर काम भी कर सकता है। ऑक्टोपस से प्रेरित इस अनोखी तकनीक को इटली के शोधकर्ताओं ने विकसित किया है, जिसे पानी के भीतर काम करने के लिए तैयार किया गया है। इसकी खासियत यह है कि यह बिल्कुल ऑक्टोपस की तरह अपने अंगों की मदद से सोचने और प्रतिक्रिया देने में सक्षम है।

Contents
ऑक्टोपस से कैसे मिली प्रेरणा?कैसे बनाया गया यह खास रोबोट?बिना केंद्रीय कंप्यूटर के कैसे लेता है फैसला?पानी के अंदर कैसे काम करता है ग्रिप सिस्टम?दिखने में कैसा है यह रोबोटिक आर्म?वजन और दिशा का भी लगा लेता है अंदाजापुराने रोबोट्स से क्यों अलग है यह तकनीक?भविष्य में कहां होगा इस्तेमाल?रोबोटिक्स की दुनिया में क्यों अहम मानी जा रही है यह उपलब्धि?

यह नई तकनीक भविष्य में समुद्री अनुसंधान, पानी के भीतर निरीक्षण और नाजुक समुद्री जीवों के अध्ययन जैसे क्षेत्रों में बड़ा बदलाव ला सकती है।

ऑक्टोपस से कैसे मिली प्रेरणा?

ऑक्टोपस को समुद्र का सबसे बुद्धिमान जीव माना जाता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसके अधिकांश तंत्रिका कोशिकाएं केवल सिर में नहीं, बल्कि इसकी भुजाओं में भी मौजूद होती हैं। यही वजह है कि इसकी हर भुजा अपने स्तर पर चीजों को महसूस कर सकती है और तुरंत प्रतिक्रिया दे सकती है।

वैज्ञानिक लंबे समय से इस क्षमता को रोबोटिक्स में शामिल करने की कोशिश कर रहे थे। अब इटली के शोधकर्ताओं ने इसी सिद्धांत को अपनाते हुए एक ऐसा सॉफ्ट रोबोटिक आर्म तैयार किया है, जो बिना किसी केंद्रीय आदेश के अपने आसपास की वस्तुओं को पहचान सकता है।

कैसे बनाया गया यह खास रोबोट?

इटली के जेनोआ स्थित शोध संस्थान में वैज्ञानिकों की टीम ने कई वर्षों तक ऑक्टोपस की कार्यप्रणाली का अध्ययन किया। इसके बाद एक मुलायम रोबोटिक आर्म तैयार किया गया, जिसके सक्शन कप रबर जैसे लचीले पदार्थ से बनाए गए हैं।

हर सक्शन कप के अंदर छोटे-छोटे प्रकाश सेंसर और डिटेक्टर लगाए गए हैं। जब कोई वस्तु इन कपों से टकराती है, तो सामग्री दबती है और प्रकाश के परावर्तन में बदलाव आता है। इसी बदलाव के आधार पर रोबोट यह समझ लेता है कि सामने मौजूद वस्तु कितनी कठोर है और उसे कितनी मजबूती से पकड़ना है।

बिना केंद्रीय कंप्यूटर के कैसे लेता है फैसला?

इस रोबोट की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विकेंद्रीकृत कार्यप्रणाली है। सामान्य रोबोट में हर निर्णय केंद्रीय कंप्यूटर लेता है, लेकिन इस रोबोट में प्रत्येक सक्शन कप स्वयं जानकारी जुटाता है और तुरंत प्रतिक्रिया देता है।

जैसे ही कोई वस्तु संपर्क में आती है, सक्शन कप खुद ही पकड़ बना लेता है। इसके लिए किसी अलग आदेश या प्रोसेसिंग का इंतजार नहीं करना पड़ता। पूरी प्रक्रिया सेकंड के बेहद छोटे हिस्से में पूरी हो जाती है।

पानी के अंदर कैसे काम करता है ग्रिप सिस्टम?

पहले के कई पानी के भीतर काम करने वाले रोबोट या तो केवल गति कर सकते थे या केवल स्पर्श महसूस कर सकते थे। दोनों क्षमताओं को एक साथ जोड़ने पर वे भारी और जटिल हो जाते थे।

नया रोबोट इन दोनों समस्याओं का समाधान करता है। यह चलते-चलते किसी वस्तु को पहचान सकता है, उसकी स्थिति समझ सकता है और उसी के अनुसार अपनी पकड़ को समायोजित कर सकता है। यही वजह है कि यह पानी के भीतर बेहद प्रभावी तरीके से काम कर सकता है।

दिखने में कैसा है यह रोबोटिक आर्म?

यह रोबोटिक आर्म आकार और संरचना में काफी हद तक असली ऑक्टोपस की भुजा जैसा दिखाई देता है। इसकी लंबाई करीब 16 इंच है और एक तरफ दस सक्शन कप लगे हुए हैं।

आर्म के भीतर तीन विशेष केबल लगाए गए हैं, जिन्हें मोटर की मदद से नियंत्रित किया जाता है। यही केबल इसे अलग-अलग दिशाओं में मुड़ने और वस्तुओं को लपेटने की क्षमता प्रदान करते हैं। इसकी पूरी संरचना विशेष सिलिकॉन सामग्री से तैयार की गई है, जो इसे एक साथ मजबूत और लचीला बनाती है।

वजन और दिशा का भी लगा लेता है अंदाजा

प्रयोगों के दौरान इस रोबोट ने बेहद सटीक परिणाम दिए हैं। यदि किसी वस्तु को दबाया जाए तो यह दबाव का अनुमान लगा सकता है। यदि उसे किसी दिशा से छुआ जाए तो यह वस्तु की दिशा भी पहचान लेता है।

परीक्षण में इसने पानी से भरे एक कंटेनर का वजन लगभग सही अनुमानित किया। वैज्ञानिकों के अनुसार यह गीले और सूखे दोनों वातावरण में समान सटीकता से काम करता है और लगातार उपयोग के बाद भी इसकी कार्यक्षमता स्थिर बनी रहती है।

पुराने रोबोट्स से क्यों अलग है यह तकनीक?

पानी के भीतर काम करने वाले अधिकांश पुराने रोबोट भारी मशीनरी और बाहरी कंप्यूटर सिस्टम पर निर्भर रहते हैं। इसके विपरीत यह नया रोबोट अपने स्थानीय सेंसरों की मदद से तुरंत निर्णय लेने में सक्षम है।

प्रयोगों के दौरान इसने कांच की बोतल और कृत्रिम समुद्री जीव जैसी वस्तुओं को सफलतापूर्वक पकड़कर दिखाया। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह किसी वस्तु को छूते ही तत्काल पकड़ बना सकता है।

भविष्य में कहां होगा इस्तेमाल?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक समुद्र की गहराइयों में अनुसंधान कार्यों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। इसकी मदद से नाजुक समुद्री जीवों और संरचनाओं को बिना नुकसान पहुंचाए संभाला जा सकेगा।

इसके अलावा खतरनाक, तंग और मुश्किल स्थानों की जांच, पानी के भीतर मरम्मत कार्य और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में भी इसका उपयोग बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं का लक्ष्य भविष्य में ऐसे और उन्नत रोबोट विकसित करना है, जो कठिन परिस्थितियों में पूरी तरह स्वायत्त रूप से काम कर सकें।

रोबोटिक्स की दुनिया में क्यों अहम मानी जा रही है यह उपलब्धि?

शोधकर्ताओं के अनुसार यह तकनीक पारंपरिक रोबोटिक्स की सोच को बदल सकती है। इसमें निर्णय लेने की क्षमता केवल एक केंद्रीय कंप्यूटर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे ढांचे में फैली हुई है। यही कारण है कि भविष्य में अधिक सक्षम, लचीले और स्वायत्त रोबोट विकसित करने की दिशा में इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

 

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