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Indian Press House > Blog > Trending News > माघ मेला विवाद ने खोला धर्म और सत्ता का पुराना पंडोरा बॉक्स : क्या मेला विवाद सिर्फ प्रोटोकॉल था ?
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माघ मेला विवाद ने खोला धर्म और सत्ता का पुराना पंडोरा बॉक्स : क्या मेला विवाद सिर्फ प्रोटोकॉल था ?

Gopal Singh
Last updated: January 24, 2026 4:27 pm
Gopal Singh
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माघ मेला विवाद ने खोला धर्म और सत्ता का पंडोरा बॉक्स
माघ मेला विवाद ने खोला धर्म और सत्ता का पंडोरा बॉक्स
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प्रयागराज : प्रयागराज के माघ मेले में शुरू हुआ एक छोटा-सा प्रोटोकॉल विवाद अब उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां यह सिर्फ संगम स्नान या वीआईपी एंट्री की कहानी नहीं रह गई है। अब यह मामला सनातन धर्म की परंपरा, शंकराचार्य पीठ की वैधता, सत्ता की भूमिका और संत समाज की एकता जैसे बड़े सवालों से जुड़ चुका है। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच जुबानी टकराव इतना तेज हो गया है कि “कालनेमि” और “औरंगजेब से भी बदतर” जैसे शब्द सार्वजनिक मंचों पर सुनाई देने लगे हैं। छह–सात दिनों से धरना, नोटिसों की बौछार, राजनीतिक बयानबाजी और संत समाज में साफ बंटवारा—यह विवाद अब प्रयागराज से निकलकर पूरे प्रदेश और देश की चर्चा बन चुका है।

संगम स्नान से शुरू हुई कहानी

मौनी अमावस्या के दिन, जब संगम स्नान को आस्था का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी परंपरागत शाही पालकी के साथ स्नान के लिए निकले। यहीं मेला प्रशासन ने उन्हें रोक दिया। दलील दी गई कि ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य की वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है, इसलिए उन्हें शंकराचार्य के तौर पर मान्यता नहीं दी जा सकती। कागजों में यह वजह भले ही सही लगे, लेकिन लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि यही नियम इससे पहले क्यों लागू नहीं किया गया। कई धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को इसी पहचान के साथ देखा जाता रहा है, फिर माघ मेले जैसे मौके पर अचानक सख्ती क्यों?

सत्ता से असहज संत की छवि

इस सवाल का जवाब तलाशते हुए नजर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की सार्वजनिक छवि पर जाती है। बीते कुछ वर्षों में वे ऐसे संत के रूप में उभरे हैं, जो सरकार की नीतियों पर खुलकर सवाल उठाते हैं। गौ-हत्या, धर्मांतरण, मंदिरों की व्यवस्था और शासन की प्राथमिकताओं पर उनकी आलोचना अक्सर सुर्खियों में रही है। यही वजह है कि वे सत्ता के साथ सहज नजर नहीं आते और न ही उन्हें सरकार के करीबी संतों में गिना जाता है। ऐसे में जब मेला प्रशासन की सख्ती सामने आई, तो कई लोगों को इसमें सिर्फ नियम पालन नहीं, बल्कि किसी गहरे संकेत की झलक दिखाई दी—मानो यह संदेश दिया जा रहा हो कि जो संत सत्ता की लाइन से अलग बोलेगा, उसके लिए व्यवस्था सख्त हो सकती है।

जुबानी जंग और बढ़ता बंटवारा

इसके बाद शुरू हुई बयानबाजी ने विवाद को और तेज कर दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का “कालनेमि” वाला बयान और उसके जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की तीखी प्रतिक्रिया ने इस मामले को पूरी तरह प्रशासनिक दायरे से बाहर निकाल दिया। अब यह सीधा सत्ता बनाम असहमति का टकराव बन गया। संत समाज भी दो हिस्सों में बंटा नजर आने लगा—एक धड़ा प्रशासन और सरकार के साथ, तो दूसरा स्वामी के समर्थन में खुलकर सामने आया। विपक्षी दलों की एंट्री ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे दिया, जिससे विवाद और फैलता चला गया।

आज हालात यह हैं कि धरना जारी है, बयान थमे नहीं हैं, लेकिन किसी ठोस संवाद की पहल नजर नहीं आती। मेला प्रशासन अपने फैसले पर कायम है और सरकार की ओर से चुप्पी साध ली गई है। इसी चुप्पी के बीच सवाल और गहरे होते जा रहे हैं। आखिरकार यह साफ होता जा रहा है कि यह विवाद शायद कभी सिर्फ संगम स्नान या प्रोटोकॉल का था ही नहीं। यह उस टकराव की कहानी बन चुका है, जहां सत्ता को असहज करने वाली धार्मिक आवाज और प्रशासनिक व्यवस्था आमने-सामने आ गई है। अब असली सवाल यह है कि क्या धार्मिक असहमति के लिए भी उतनी ही जगह है, जितनी सहमति के लिए। यही सवाल इस पूरे मामले को एक साधारण प्रशासनिक घटना से कहीं आगे ले जाता है।

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TAGGED: Current Affairs India, Dharma And Power, Government Vs Saints, Hindu Traditions, Indian Politics, Indian Press House समाचार, Magh Mela Controversy, Prayagraj News, Protocol Dispute, Religious Politics, Sangam Snan, Sant Samaj, Shankaracharya Row, Spiritual Leaders, Uttar Pradesh News, Yogi Adityanath
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