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Reading: 2 साल में 15 बार राहत: आखिर Asaram को बार-बार बेल कैसे मिली?
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2 साल में 15 बार राहत: आखिर Asaram को बार-बार बेल कैसे मिली?

news desk
Last updated: June 3, 2026 4:59 pm
news desk
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भारत की न्याय व्यवस्था में एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जिस पर करोड़ों लोग भरोसा करते हैं। चर्चा का केंद्र हैं Asaram, जिन्हें 2018 में नाबालिग से रेप मामले में दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई थी।लेकिन पिछले दो वर्षों में जिस तरह उन्हें लगातार मेडिकल आधार पर बेल, पैरोल और राहत मिलती रही, उसने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक बहस छेड़ दी है।

2024 से 2026 तक लगातार राहत

मार्च 2024 से लेकर अप्रैल 2026 तक अलग-अलग अदालतों और प्रशासनिक आदेशों के जरिए Asaram को करीब 15 बार राहत मिली। इनमें मेडिकल बेल, पैरोल विस्तार और इलाज के लिए अनुमति जैसी राहतें शामिल रहीं।

21 मार्च 2024 को उन्हें इलाज के लिए जोधपुर स्थित आरोग्यम सेंटर जाने की अनुमति मिली। इसके बाद अप्रैल, जुलाई और अगस्त 2024 में भी मेडिकल आधार पर राहत दी गई। नवंबर 2024 में अदालत ने उन्हें उचित अवधि तक आरोग्यम में रहने की अनुमति दी।

2025 में यह सिलसिला और तेज़ दिखाई दिया। जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अगस्त में लगातार राहत और विस्तार दिए गए। आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ एक-दो बार की मानवीय राहत नहीं, बल्कि एक पैटर्न जैसा दिखाई देता है।

जनता के मन में उठते सवाल

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी कैदी की स्वास्थ्य स्थिति गंभीर हो, तो अदालतें मानवीय आधार पर राहत दे सकती हैं। यह पूरी तरह न्यायिक अधिकार के दायरे में आता है।

लेकिन आम जनता का सवाल इससे अलग है। क्या देश की जेलों में बंद हजारों बुजुर्ग और बीमार कैदियों को भी इतनी ही तेजी और आसानी से राहत मिलती है? क्या एक गरीब या साधारण कैदी को भी बार-बार मेडिकल आधार पर बेल मिल पाती है?

यही कारण है कि सोशल मीडिया पर VIP Justiceऔर Equal Law जैसे मुद्दे लगातार ट्रेंड कर रहे हैं।

मीडिया की चुप्पी पर भी सवाल

कई लोग यह भी पूछ रहे हैं कि देश का mainstream media इस मुद्दे पर उतना आक्रामक क्यों नहीं दिखता, जितना दूसरे मामलों में दिखाई देता है। आलोचकों का कहना है कि बड़े और प्रभावशाली नामों के मामलों में अक्सर बहस का स्वर बदल जाता है।

हालांकि यह भी सच है कि अदालतों के फैसले संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होते हैं और किसी भी राहत को कानूनी दायरे में ही मंजूरी दी जाती है।

फिर भी लोकतंत्र में सवाल पूछना जनता का अधिकार है और फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है
क्या भारत में कानून सचमुच सबके लिए बराबर है, या प्रभावशाली लोगों के लिए रास्ते अपेक्षाकृत आसान हो जाते हैं?

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