कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी में बढ़ती अंदरूनी खींचतान ने न सिर्फ नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति किस दिशा में जाएगी, इस पर भी चर्चा तेज हो गई है। इसी बीच विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाओं ने भी राजनीतिक हलचल को और बढ़ा दिया है।
टीएमसी में जारी उठापटक पर पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री दिलीप घोष ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी पहले से यह कहती रही है कि जिस दिन टीएमसी चुनाव हारेगी, उसके बाद पार्टी के भीतर संकट खड़ा हो जाएगा। उनका दावा है कि वर्तमान हालात उसी दिशा में इशारा कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कई लोग उनकी पार्टी से संपर्क कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल पार्टी ने अपने दरवाजे बंद रखे हैं।
चुनावी हार के बाद बढ़ा असंतोष
विधानसभा चुनाव में हार के बाद टीएमसी के भीतर लंबे समय से दबा असंतोष अब सामने आने लगा है। पार्टी के कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच नेतृत्व और संगठन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि ममता बनर्जी की लोकप्रियता और नेतृत्व क्षमता पर सीधे तौर पर कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा, लेकिन पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर मतभेद साफ दिखाई देने लगे हैं।
पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की जरूरत है और फैसले लेने की प्रक्रिया को अधिक व्यापक बनाया जाना चाहिए।
58 विधायकों के समूह ने बढ़ाई मुश्किलें
टीएमसी के लिए सबसे बड़ा झटका तब माना गया जब 58 विधायकों के एक समूह ने ऋतब्रता बनर्जी के नेतृत्व में मौजूदा नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इस गुट ने विधानसभा में अलग पहचान बनाने की कोशिश की और अपने नेता को विपक्ष का नेता बनाए जाने की मांग की।
बताया जा रहा है कि विधानसभा अध्यक्ष ने इस गुट को मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता भी दे दी है। दिलचस्प बात यह है कि यह समूह खुद को टीएमसी का हिस्सा बताता है, लेकिन पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठा रहा है।
बागी नेताओं का आरोप है कि पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कमजोर हुई हैं और कुछ लोगों के हाथों में फैसले सीमित हो गए हैं।
ममता पर भरोसा, अभिषेक पर आपत्ति
बागी गुट लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि उनका विरोध ममता बनर्जी से नहीं है। उनका कहना है कि ममता अब भी उनकी नेता हैं और वे उनका सम्मान करते हैं। हालांकि अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका को लेकर उनके भीतर असहमति है।
पार्टी के अंदर इसे नेतृत्व और उत्तराधिकार की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है। एक तरफ अभिषेक बनर्जी को भविष्य के नेतृत्व के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ नेता इस दिशा में बदलाव के पक्ष में नहीं हैं। यही वजह है कि संगठन के भीतर मतभेद लगातार गहराते दिखाई दे रहे हैं।
मेयरों के इस्तीफे ने बढ़ाई चिंता
पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा उस समय और तेज हो गई जब कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने अपने पद से इस्तीफा दिया। फिरहाद हकीम को लंबे समय से ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिना जाता रहा है। उनके इस्तीफे ने राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया।
इसके बाद बिधाननगर नगर निगम की मेयर कृष्णा चक्रवर्ती ने भी इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। लगातार सामने आ रहे इस्तीफों को पार्टी के भीतर चल रहे बदलाव और अस्थिरता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा
राजनीतिक विश्लेषण चाहे जो हों, लेकिन मौजूदा हालात में सबसे बड़ी चुनौती ममता बनर्जी के सामने है। सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी को एकजुट बनाए रखना और असंतुष्ट नेताओं को साथ लेकर चलना उनके लिए आसान नहीं होगा।
टीएमसी के भीतर चल रही खींचतान अगर लंबे समय तक जारी रहती है तो इसका सीधा असर पार्टी की राजनीतिक ताकत पर पड़ सकता है। दूसरी ओर विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है और हालात का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है।
बंगाल की राजनीति किस दिशा में जाएगी?
मौजूदा घटनाक्रम यह संकेत दे रहा है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति आने वाले दिनों में और अधिक दिलचस्प हो सकती है। टीएमसी के भीतर नेतृत्व, संगठन और भविष्य की रणनीति को लेकर चल रही बहस अब खुलकर सामने आ चुकी है।
ऐसे में सबकी नजर ममता बनर्जी पर टिकी है कि वे इस संकट से पार्टी को कैसे बाहर निकालती हैं। फिलहाल इतना साफ है कि टीएमसी एक संक्रमण काल से गुजर रही है और आने वाले महीनों में पार्टी के भीतर कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।