वर्चस्व की चाहत में पानी के लिए राजधानी शिफ्ट
विश्व मंच पर जो ईरान मध्य पूर्व की राजनीति में अपने वर्चस्व की चाहत रखता है और जो परमाणु शक्ति बनने की जिद पाले बैठा है, उस देश की राजधानी आज अपने ही नागरिकों के लिए पानी की व्यवस्था करने में विफल हो गई है. ये विडंबना आज ईरानी शासन की सबसे बड़ी विफलता बन गया है.
किसी देश की राजधानी बदलना सिर्फ एक प्रशासनिक कदम नहीं होता, बल्कि ये इतिहास, अर्थव्यवस्था और अस्तित्व की सबसे बड़ी जंग का ऐलान होता है. ईरान अब इसी निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. ईरान की धड़कन माने जाने वाली राजधानी तेहरान अपनी ही बढ़ती आबादी, प्रदूषण और सबसे बढ़कर भीषण जल संकट के बोझ से तड़प रही है.
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने इस स्थानांतरण को ‘विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता’ बताते हुए देश के सर्वोच्च नेता आयतोल्लाह अली खामेनेई के सामने ये प्रस्ताव रखा है.
तेहरान: वो शहर जिसके पास सिर्फ 14 दिन का पानी बचा था
ईरान के इस बड़े फैसले के केंद्र में तेहरान की डरावनी प्राकृतिक स्थिति है. 90 लाख से अधिक की आबादी वाले इस शहर ने दशकों के सबसे भयंकर सूखे का सामना किया है और अब आधिकारिक चेतावनियां सामने आईं कि राजधानी में पेयजल का भंडार केवल दो सप्ताह यानि 14 दिन के लिए ही बचा है ‘अमीर कबीर’ जैसे बड़े बांध लगभग सूख चुके हैं.
जनसंख्या के बेतहाशा दबाव, वायु प्रदूषण और भूजल के अति-दोहन के कारण भू-धंसाव (Land Subsidence) जैसी विनाशकारी आपदाएं तो आ ही रही हैं, जो ईरान को अब ‘पतन की और’ धकेल रही हैं. राष्ट्रपति ने यहा तक चेतावनी दी थी कि यदि जल्द बारिश नहीं हुई, तो तेहरान शहर को खाली करना पड़ सकता है.
तेहरान की विदाई के बाद ईरान की नई उम्मीद बनकर उभर रहा है मकरान. ये दक्षिणी तटीय क्षेत्र अब ईरान की नई राजधानी बनाने के लिए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने अपील की है.
मकरान बनेगी नई राजधानी
मकरान का इतिहास बेहद विरोधाभासी रहा है. प्राचीनकाल में, ये इलाका गेड्रोसियन रेगिस्तान के नाम से जाना जाता था. जब सिकंदर अपनी सेना के साथ भारत से लौट रहे था, तब इसी रेगिस्तान ने उनकी सेना के एक बड़े हिस्से को पानी और भूख से निगल लिया था. एक समय जिसे ‘मौत का मैदान’ माना गया, ईरान अब उसी जगह पर एक समृद्ध भविष्य बनाना चाहता है.
मकरान की भौगोलिक स्थिति ईरान के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है. ये ओमान की खाड़ी और अरब सागर के पास है. नई राजधानी बनने से ईरान को समुद्र-आधारित अर्थव्यवस्था (Sea-based Economy) विकसित करने, समुद्री व्यापार को बढ़ावा देने और चाबहार बंदरगाह जैसी महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों का पूरा लाभ उठाने का मौका मिलेगा. साथ ही इजरायल की मिसाइलों के जद से भी मकरान बाहर रहेगा.
भविष्य की चुनौती और विरोध
इस परियोजना को लेकर विरोध भी कम नहीं है. सरकार के विरोधियों और आलोचकों ने इस पर लगने वाले भारी-भरकम खर्च को लेकर चिंता जताई है. ईरान के पूर्व गृह मंत्री अहमद वाहिदी ने इस परिवर्तन की अनुमानित लागत लगभग 100 अरब डॉलर बताई है. आलोचकों का तर्क है कि जब देश पहले से ही गंभीर आर्थिक तनावो से जूझ रहा है और इतना बड़ा खर्च उठाना देश के लिए बहुत मुश्किल होगा.
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