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बेहोशी, ब्लैकआउट और सेक्स! क्या है “डेट रेप ड्रग्स” जो यूरोप में मचा रहा है तांडव, भारत के लिए भी खतरे की घंटी?

नई दिल्ली: जर्मनी ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. अब वहां डेट रेप ड्रग्स (जैसे GHB, GBL या KO-ट्रोपफेन) का इस्तेमाल करके किसी को बेहोश कर यौन हमला करना हथियार इस्तेमाल करने के बराबर माना जाएगा. इससे दोषियों को कम से कम 5 साल की सजा और ज्यादा सख्ती से दंड मिलेगा. जर्मनी में 2024 में यौन अपराधों के 54,000 से ज्यादा मामले दर्ज हुए, जिनमें कई ड्रग्स से जुड़े थे. कानून में यह बदलाव इस्तांबुल कन्वेंशन (महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने का अंतरराष्ट्रीय समझौता) का पालन भी है.
लेकिन सवाल है—भारत क्या कर रहा है? यहां डेट रेप ड्रग्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, पर कानून अभी भी पुराने ढर्रे पर ही चल रहा है. विशेषज्ञ कह रहे हैं कि भारत को भी जर्मनी से सीख लेनी चाहिए और इन ड्रग्स को “हथियार” या “जहर” की श्रेणी में डालना चाहिए. आइए समझते हैं पूरी स्थिति और भारत के लिए सबक…

भारत में डेट रेप ड्रग्स के घटनाएं

भारत में रोहिप्नॉल, जीएचबी, कीटामाइन जैसे ड्रग्स का इस्तेमाल पार्टियों, बार, डेट, और यहां तक कि घरों में भी बढ़ रहा है. ये ड्रग्स बिल्कुल रंगहीन, गंधहीन और बेस्वाद होते हैं—ड्रिंक में मिलाकर किसी को भी बेहोश किया जा सकता है. नतीजा? बेहोशी, ब्लैकआउट, शरीर पर कंट्रोल खत्म.
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों में पार्टी कल्चर के कारण ये मामले ज्यादा सामने आ रहे हैं. कई बड़े मामले—जैसे कठुआ (2018) और चेन्नई गैंगरेप—इन्हीं ड्रग्स से जुड़े थे. NCRB के मुताबिक 2022 में रेप के 31,000+ मामले दर्ज हुए, लेकिन DFSA (drug-facilitated sexual assault) के अलग आंकड़े ही नहीं रखे जाते. विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ 10% केस ही रिपोर्ट हो पाते हैं क्योंकि ये ड्रग्स 12–24 घंटे में शरीर से गायब हो जाते हैं.

भारत के कानूनों में क्या कमी है?

• BNS (पुरानी IPC 376) में रेप की परिभाषा है, पर ड्रग्स को “हथियार” नहीं माना जाता.
• BNS की धारा 109 या NDPS एक्ट लग सकता है, पर ये केस को मजबूत नहीं बनाते.
• POCSO सख्त है, पर डेट-रेप ड्रग्स को लेकर कोई खास प्रावधान नहीं.
सबसे बड़ी दिक्कत—टॉक्सिकोलॉजी टेस्ट समय पर नहीं होते, सबूत तेजी से नष्ट हो जाते हैं, और कोर्ट में “सहमति से सम्बन्ध बनाने” का बहाना आसानी से चल जाता है. इसी वजह से कन्विक्शन रेट सिर्फ 30% के आसपास है.

जर्मनी से क्या सीखे भारत?

जर्मनी से भारत यह सीख सकता है कि डेट रेप ड्रग्स को सीधे हथियार की तरह माना जाए, DFSA यानी ड्रग-फैसिलिटेटेड सेक्सुअल असॉल्ट के लिए एक अलग और स्पष्ट कानूनी सेक्शन बनाया जाए, ऐसे अपराधों के लिए न्यूनतम सजा तय की जाए ताकि सख्त दंड का स्पष्ट संदेश जाए. फॉरेंसिक सिस्टम को तेज़ और आधुनिक बनाया जाए ताकि सबूत समय रहते सुरक्षित हो सकें. और पीड़िताओं को तुरंत मेडिकल सहायता उपलब्ध कराई जाए ताकि उनके अधिकार और स्वास्थ्य दोनों सुरक्षित रहें.

आगे क्या ?

विशेषज्ञों और महिला संगठनों का भी यही कहना है कि भारत को अब इस दिशा में गंभीर कानूनी सुधार करने की जरूरत है, क्योंकि हर दिन भारत में औसतन 86 रेप केस दर्ज होते हैं और असल संख्या इससे कहीं ज्यादा होती है, ऐसे में जर्मनी जैसे सख्त कानून लागू होने से न सिर्फ अपराधियों को कड़ी सजा मिलेगी बल्कि समाज को भी साफ संदेश जाएगा कि पीड़िता को नहीं, अपराधी को दोष देना है. इसलिए अब समय आ गया है कि भारत डेट रेप ड्रग्स को “हथियार” माने और DFSA पर अलग, सख्त और आधुनिक कानून बनाए.

news desk

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