हवाई जहाज में सफर करते समय आपने कभी सोचा है कि अगर उड़ान के दौरान कोई पक्षी विमान के इंजन से टकरा जाए तो क्या होगा। बर्ड स्ट्राइक विमानन क्षेत्र की बड़ी चुनौतियों में से एक है। इसी खतरे से निपटने के लिए विमानों के इंजन और दूसरे अहम हिस्सों की कड़ी टेस्टिंग की जाती है। इसी टेस्टिंग में एक बेहद हैरान करने वाला नाम है ‘चिकन गन टेस्ट’।
नाम सुनकर भले ही यह अजीब लगे, लेकिन इसका मकसद विमान और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस टेस्ट के जरिए यह जांचा जाता है कि विमान का इंजन तेज रफ्तार से किसी पक्षी के टकराने की स्थिति में कितना नुकसान झेल सकता है और उसके बाद भी काम करता रह सकता है या नहीं।
चिकन गन टेस्ट को आमतौर पर बर्ड स्ट्राइक टेस्ट का हिस्सा माना जाता है। इसमें एक खास तरह की वायवीय तोप का इस्तेमाल किया जाता है। इसके जरिए पक्षी के शरीर जैसी सामग्री को तेज गति से विमान के इंजन या उसके दूसरे हिस्सों की तरफ छोड़ा जाता है।
इस परीक्षण का उद्देश्य उड़ान के दौरान होने वाली वास्तविक बर्ड स्ट्राइक जैसी स्थिति तैयार करना होता है। इंजीनियर इसके बाद देखते हैं कि इंजन के ब्लेड और दूसरे हिस्सों पर टक्कर का कितना असर पड़ा और इंजन ने अपना काम किस तरह जारी रखा।
ऐतिहासिक रूप से ऐसे परीक्षणों में असली मुर्गों का इस्तेमाल किया जाता रहा है, क्योंकि उनके शरीर में पानी, मांस और हड्डियों का मिश्रण होता है। यह संयोजन पक्षी के शरीर के भौतिक प्रभाव को दोहराने के लिए उपयोगी माना गया।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि आज विमानन क्षेत्र में टेस्टिंग के लिए हर जगह जीवित पक्षियों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। कई परीक्षणों में कृत्रिम या जैल आधारित पक्षी सिमुलेंट और दूसरे मानकीकृत माध्यमों का भी इस्तेमाल किया जाता है।
हवाई जहाज और पक्षी की टक्कर को बर्ड स्ट्राइक कहा जाता है। टेकऑफ और लैंडिंग के दौरान विमानों की ऊंचाई कम होने की वजह से ऐसी घटनाओं का जोखिम ज्यादा रहता है।
अगर कोई बड़ा पक्षी इंजन में चला जाए तो उसके ब्लेड और दूसरे हिस्सों को नुकसान पहुंच सकता है। गंभीर स्थिति में इंजन की क्षमता प्रभावित हो सकती है और विमान को आपात स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
इसीलिए विमान के इंजन को डिजाइन करते समय यह सुनिश्चित किया जाता है कि वह संभावित बर्ड स्ट्राइक के असर को झेल सके।
टेस्ट के दौरान पक्षी के वजन और आकार के अनुरूप टेस्ट सामग्री को तैयार किया जाता है। इसके बाद उसे एक विशेष कैनन में रखा जाता है और निर्धारित गति से इंजन या विमान के संबंधित हिस्से की ओर छोड़ा जाता है।
टक्कर के दौरान हाई स्पीड कैमरों और सेंसर की मदद से पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड की जाती है। इंजीनियर यह देखते हैं कि इंजन के ब्लेड में कितना नुकसान हुआ, इंजन का प्रदर्शन कितना प्रभावित हुआ और टक्कर के बाद वह सुरक्षित तरीके से काम कर पा रहा है या नहीं।
चिकन गन या बर्ड स्ट्राइक टेस्ट का मकसद विमान को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा सीमा को परखना है। टेस्ट से मिले आंकड़ों के आधार पर इंजीनियर इंजन के डिजाइन और उसकी मजबूती में जरूरी बदलाव करते हैं।
यानी अगली बार जब आप आसमान में किसी विमान को उड़ता देखें, तो याद रखिए कि उसके इंजन को सिर्फ हवा और गति के लिए ही नहीं, बल्कि पक्षियों से होने वाली संभावित टक्कर जैसी चुनौती के लिए भी तैयार किया जाता है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी विमानन सुरक्षा और बर्ड स्ट्राइक टेस्ट से जुड़ी सामान्य तकनीकी जानकारी पर आधारित है। अलग-अलग विमान निर्माता और नियामक मानकों के अनुसार टेस्टिंग की प्रक्रिया अलग हो सकती है।
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