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जब लखनऊ महका सूफ़ियाना सुरों से…कबीर फ़ेस्टिवल में अदब, दोस्ती और खजुराहो की कहानियों का अलौकिक संगम

SYED MOHAMMAD ABBAS
Last updated: December 1, 2025 12:53 pm
SYED MOHAMMAD ABBAS
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लखनऊ की शाम ने उस रात जैसे अपने दिल के दरवाज़े पूरी दुनिया के लिए खोल दिए हों. गोमतीनगर स्थित संगीत अकादमी की हवाओं में सूफ़ियाना सरगम घुली थी, रोशनियों में नज़्मों की चमक थी और हर कोने में अदब की खुशबू तैर रही थी.

कबीर फ़ेस्टिवल का दसवां बरस-दोस्तियों का शानदार जश्न!और इस जश्न ने राजधानी के कला-प्रेमियों को एक जादुई दुनिया में पहुंचा दिया, मशहूर लेखकों, शायरों, विचारकों,गायकों और कला के दिग्गजों का ऐसा अलौकिक संगम शायद ही कहीं एक साथ देखने को मिले.

हर चेहरा एक किस्सा, हर आवाज़ एक तरन्नुम, और हर लफ़्ज़ जैसे रूह को छू लेने वाली धीमी बारिश. लखनऊ में आयोजित Kabeer Kabir Festival के बीच खजुराहो डायरीज़ का विशेष सत्र आयोजित हुआ, जहां उत्सव का माहौल चरम पर रहा। कार्यक्रम में कई नामचीन साहित्यकार, कलाकार और पत्रकार मौजूद रहे, जिन्होंने अपने शब्दों और सुरों से शाम को अविस्मरणीय बना दिया.

इस अवसर पर पुस्तक के लेखक डॉ. उत्कर्ष सिन्हा भी विशेष रूप से मौजूद रहे। मंच से अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी खजुराहो यात्रा की कहानी वर्ष 2015 में शुरू हुई थी.

डॉ. सिन्हा ने अतीत के पन्ने पलटते हुए कहा कि उस दौर में खजुराहो में विदेशी पर्यटकों की भरमार होती थी. वे घंटों दीवारों पर बने अद्भुत शिल्प और चित्रकला को निहारते रहते, लेकिन अधिकांश भारतीय पर्यटक वहाँ चार-पाँच घंटे बिताकर चोरी-छिपे उन दीवारों पर नज़र डालते और चुपचाप आगे बढ़ जाते. इतना ही नहीं, वे अपने बच्चों को भी उन शिल्पों को देखने से रोकते रहते.

उन्होंने कहा कि खजुराहो के मंदिरों पर उकेरी गई कहानियाँ हमारे सोच से बिल्कुल अलग और गहरी हैं.बतौर पत्रकार वे राजनीति, अपराध और घोटालों की खबरों को वर्षों से कवर करते रहे, लेकिन खजुराहो ने उन्हें एक अलग तरह से रोक लिया,जैसे किसी ने भीतर से आवाज़ दी हो.

“2015 के बाद से मैं लगातार वहाँ जा रहा हूँ,” उन्होंने कहा। “न जाने कब मुझे महसूस हुआ कि खजुराहो पर लिखना है. बस एक दिन लगा कि मेरे भीतर का पत्रकार इस रहस्य, इस कला, इस इतिहास को खोजकर दुनिया के सामने लाना चाहता है.और फिर मेरी रिसर्च की यात्रा शुरू हुई.

अपनी पुस्तक के बारे में उन्होंने बेहद खूबसूरती से कहा“अगर आप मेरे नज़रिए से ‘खजुराहो डायरीज़’ को पूछें, तो मैं इसे एक प्रेम पत्र कहूँगा.”

कार्यक्रम में प्रख्यात कवि उदय प्रताप सिंह, मशहूर शायर और गायक हरिओम, वरिष्ठ पत्रकार कुमार भावेश चंद्र, नागेन्द्र , शिखा श्रीवास्तव, अर्शना आनंद, और फारुख़ आर. खान समेत कई साहित्य और कला प्रेमियों ने हिस्सा लिया.

सभी ने मंच पर अपने विचार, कविता, संगीत और अनुभव साझा कर माहौल को और भी रचनात्मक बनाया। आयोजन टीम की ओर से दीपक कबीर, संगीता जायसवाल, शिवालिका आचार्य, उपासना और उन सभी साथियों का विशेष धन्यवाद किया गया, जो पर्दे के पीछे से इस सुंदर आयोजन को सफल बनाने में जुटे रहे.

सूफ़ियाना संगीत ने जैसे दिलों पर हाथ रखकर दुआ दी, नरम, गहरी, दिल की परतों में उतरती हुई.शायरी की महफ़िल में हर शेर तालियों में घुलकर एक नई मोहब्बत बन जाता.साहित्यिक गोष्ठियों में दोस्तियाँ, विचार और यादें, चाय की भाप की तरह हवा में तैरती रहीं.

यह फ़ेस्टिवल सिर्फ़ एक आयोजन नहीं था बल्कि यह लखनऊ की विरासत, उसकी तहज़ीब और उसकी रूह का चमकता हुआ आईना था.

दस साल की दोस्तियों का ये जश्न,हर दिल में एक ही एहसास छोड़ गया-अदब ज़िंदा है… और दोस्ती भी!

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