सेहत

दबी हुई नस की समस्या क्या है, जिससे जूझ रहे हैं सोनू निगम? गर्दन दर्द से लेकर झुनझुनी तक जानिए इसके खतरे और संकेत

नई दिल्ली: गर्दन में लगातार दर्द, हाथों में झुनझुनी या शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन जैसी समस्या सिर्फ सामान्य थकान नहीं हो सकती। मेडिकल भाषा में इसे पिंच्ड नर्व यानी दबी हुई नस की समस्या कहा जाता है, जिसे सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी भी कहा जाता है। यह स्थिति तब बनती है जब गर्दन के आसपास के टिश्यू या डिस्क नसों पर दबाव डालने लगते हैं, जिससे दर्द और असहजता बढ़ जाती है।

क्या है दबी हुई नस की समस्या?

दबी हुई नस की स्थिति में गर्दन की नसों पर दबाव पड़ने लगता है, जिससे नसें ठीक से काम नहीं कर पातीं। इसका असर केवल गर्दन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह दर्द पीठ, हाथों और पैरों तक भी फैल सकता है। इस वजह से व्यक्ति को झुनझुनी, जलन और कमजोरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

इसके प्रमुख लक्षण क्या हैं?

इस समस्या में कई तरह के संकेत देखने को मिलते हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना नुकसानदायक हो सकता है। इनमें गर्दन, पीठ, हाथ या पैरों में दर्द शामिल है। इसके अलावा झुनझुनी, जलन, मांसपेशियों में थकावट और सुन्नपन जैसी स्थिति भी सामने आ सकती है। कई मामलों में प्रभावित हिस्से में सही प्रतिक्रिया न मिलने की समस्या भी देखी जाती है।

कैसे किया जाता है इसका निदान?

डॉक्टर इस समस्या की पहचान के लिए सबसे पहले शारीरिक जांच करते हैं, जिसमें गर्दन, कंधे और हाथों की स्थिति को परखा जाता है। इसके बाद स्पर्लिंग टेस्ट किया जाता है, जिसमें गर्दन को विशेष तरीके से झुकाकर लक्षणों की जांच की जाती है।

इसके अलावा एक्स-रे, सीटी स्कैन और एमआरआई स्कैन जैसी तकनीकों का उपयोग रीढ़ और नसों की स्थिति को समझने के लिए किया जाता है। कुछ मामलों में इलेक्ट्रोमायोग्राफी टेस्ट भी किया जाता है, जिससे नसों में संकेतों की गति का आकलन होता है।

किन कारणों से होती है यह समस्या?

दबी हुई नस की समस्या कई कारणों से हो सकती है। उम्र बढ़ने के साथ रीढ़ की संरचना में बदलाव इसका एक प्रमुख कारण है। इसके अलावा भारी वजन उठाना, लंबे समय तक एक ही मुद्रा में रहना, लगातार कंपन करने वाली मशीनों का उपयोग, या कुछ खेल गतिविधियां भी इसका कारण बन सकती हैं।

इलाज और राहत के उपाय क्या हैं?

अगर 5 से 6 सप्ताह तक आराम और सामान्य देखभाल के बाद भी दर्द में सुधार नहीं होता, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है। शुरुआती स्तर पर आइस और हीट थेरेपी से सूजन और दर्द में राहत मिल सकती है।

इसके साथ फिजिकल थेरेपी भी काफी प्रभावी मानी जाती है, जिसमें गर्दन की मांसपेशियों को मजबूत करने और लचीलापन बढ़ाने वाले व्यायाम शामिल होते हैं। सही समय पर इलाज लेने से इस समस्या को गंभीर होने से रोका जा सकता है।

 

vineet verma

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