मिडिल ईस्ट (Middle East) में चल रहे महायुद्ध के बीच एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। ईरान ने अपनी मिसाइल तकनीक को इतना घातक और हाईटेक बना लिया है कि अमेरिका का सबसे एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम ‘थाड’ (THAAD) और इजरायल का ‘आयरन डोम’ (Iron Dome) भी उसके आगे बेबस नजर आ रहे हैं। अमेरिकी खुफिया अधिकारियों के मुताबिक, इस खतरनाक खेल के पीछे रूस और चीन का ‘सीक्रेट ट्रायंगुलर कोऑर्डिनेशन’ (Gupt Triangle) है, जो ईरान को महाशक्तिशाली बना रहा है।
ईरान की नई मिसाइल पावर की 5 बड़ी बातें
- डिफेंस सिस्टम फेल: ईरान की नई मिसाइलें हवा में ही रास्ता बदलने (Maneuver) में सक्षम हैं, जिससे अमेरिकी और इजरायली रडार उन्हें ट्रैक नहीं कर पा रहे हैं।
- रूस का ‘सैटेलाइट’ सपोर्ट: रूस यूक्रेन युद्ध के बदले ईरान को रीयल-टाइम सैटेलाइट इमेजरी और एडवांस ड्रोन टारगेटिंग तकनीक दे रहा है, जिससे ईरान के हमले अचूक हो गए हैं।
- चीन की गुप्त एंट्री: अमेरिकी अधिकारियों को शक है कि दुनिया में हाइपरसोनिक तकनीक में सबसे आगे चल रहा चीन, पर्दे के पीछे से ईरान को इंजीनियरिंग सपोर्ट और घातक कंपोनेंट्स दे रहा है।
- फतह-1 और फतह-2 का खौफ: ईरान ने ऐसी हाइपरसोनिक मिसाइलें तैयार कर ली हैं जो आवाज की रफ्तार से 5 गुना तेजी (5 Mach) से उड़ सकती हैं और इनकी रेंज 1400 किमी तक है।
- बदल गया युद्ध का बैलेंस: जॉर्डन एयरबेस पर हुए हालिया हमले में अमेरिकी सैनिकों की मौत इस बात का सबूत है कि ईरान की मिसाइलों की एक्यूरेसी अब 100% के करीब पहुंच चुकी है।
हवा में रास्ता बदलती हैं मिसाइलें, ‘आयरन डोम’ भी खा गया चकमा!
अब तक माना जाता था कि इजरायल का आयरन डोम और अमेरिका का पैट्रियट मिसाइल सिस्टम किसी भी हमले को रोक सकते हैं। लेकिन ईरान की नई ‘फतह’ (Fattah) हाइपरसोनिक मिसाइलों ने इस घमंड को तोड़ दिया है। ये मिसाइलें सॉलिड फ्यूल (ठोस ईंधन) से चलती हैं और इनका वॉरहेड टर्मिनल फेज (आखरी वक्त) में अचानक अपनी दिशा बदल लेता है। जब तक अमेरिकी इंटरसेप्टर मिसाइल उसे मारने के लिए आगे बढ़ती है, ईरानी मिसाइल अपना रास्ता बदलकर सीधे टारगेट को तबाह कर देती है।
रूस-चीन-ईरान का खतरनाक ‘त्रिकोण’ (The Deadly Axis)
वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे विवाद में रूस और चीन की एंट्री ने अमेरिका की टेंशन सबसे ज्यादा बढ़ा दी है।
इंटेलिजेंस शेयरिंग का खेल: रूस को यूक्रेन से लड़ने के लिए ईरान से घातक ड्रोन मिल रहे हैं। इसके बदले में मॉस्को ने तेहरान के साथ अपनी टॉप-सीक्रेट सैटेलाइट इंटेलिजेंस शेयरिंग बढ़ा दी है। इसके जरिए ईरान को अमेरिकी बेस की पल-पल की लोकेशन मिल रही है। वहीं, चीन की हाइपरसोनिक रिसर्च का फायदा भी ईरान को मिल रहा है।
जॉर्डन हमला था ट्रेलर, क्या मिडिल ईस्ट में शुरू हुई ‘हाइपरसोनिक आर्म्स रेस’?
पहले ईरान की मिसाइलें अक्सर निशाना चूक जाती थीं, लेकिन अब घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) की मदद से ईरान ने गेम बदल दिया है। 1400 किलोमीटर की रेंज होने के कारण पूरा इजरायल और खाड़ी देशों में बने तमाम अमेरिकी सैन्य ठिकाने अब ईरान के सीधे निशाने पर हैं। जॉर्डन बेस पर हुआ हमला इसका सीधा प्रमाण है।
आगे क्या होगा? भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई तकनीक ने पुरानी डिफेंस स्ट्रेटजी को पूरी तरह आउटडेटेड (पुराना) कर दिया है। अगर अमेरिका और इजरायल ने जल्द ही हाइपरसोनिक मिसाइलों को रोकने का कोई नया तोड़ नहीं ढूंढा, तो हिज्बुल्लाह और हूती जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स और मजबूत होंगे, जिससे यह क्षेत्रीय जंग एक विनाशकारी वैश्विक युद्ध का रूप ले सकती है।