लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे का मुद्दा सियासी चर्चा के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की प्रदेश के नेताओं के साथ हुई बैठक के बाद पार्टी की चुनावी रणनीति और गठबंधन में उसकी हिस्सेदारी को लेकर नए सवाल उठ रहे हैं। कांग्रेस करीब 200 विधानसभा सीटों पर चुनावी तैयारी करने की बात कह रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव गठबंधन में कांग्रेस को इतनी बड़ी हिस्सेदारी देने के लिए तैयार होंगे?
हालांकि, 200 सीटों पर तैयारी करने का मतलब यह नहीं है कि सपा से इतनी ही सीटें मांगने का अंतिम फैसला हो चुका है। मीडिया रिपोर्टों में कांग्रेस की संभावित मांग को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। एनडीटीवी की 20 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस करीब 125 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छुक है और सपा के सामने 125 से 150 सीटों की सूची रख सकती है। वहीं, अमर उजाला की रिपोर्ट में कांग्रेस की करीब 200 सीटों पर तैयारी का जिक्र है।
403 सीटों में 200 पर तैयारी, गठबंधन में कितना मिलेगा हिस्सा?
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। ऐसे में कांग्रेस की ओर से 200 सीटों पर तैयारी की रणनीति को गठबंधन की बातचीत में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। कांग्रेस का तर्क है कि उसे उन क्षेत्रों में चुनाव लड़ने का अवसर मिलना चाहिए, जहां पार्टी का संगठन, स्थानीय नेतृत्व और जीतने की संभावना बेहतर है।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी भी प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखना चाहेगी। मीडिया रिपोर्टों में सपा की ओर से करीब 350 सीटों पर तैयारी किए जाने की बात कही गई है। अगर यह आंकड़ा सही साबित होता है, तो दोनों दलों की प्राथमिकताओं के बीच तालमेल बैठाना आसान नहीं होगा।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सपा कांग्रेस को केवल 53 सीटें ही देगी या कांग्रेस 200 सीटों पर ही गठबंधन की शर्त रखेगी। अंतिम फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की बातचीत और सीटों पर जीत की संभावना के आकलन के बाद ही सामने आएगा।
अखिलेश यादव के लिए सीट बंटवारा क्यों होगा अहम?
अखिलेश यादव पहले भी चुनाव में सीटों की संख्या से ज्यादा जीत की संभावना को अहम बता चुके हैं। उनका रुख रहा है कि गठबंधन में सीटों का फैसला इस आधार पर होना चाहिए कि कौन-सा उम्मीदवार संबंधित विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को चुनौती दे सकता है।
कांग्रेस भी 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन और पुराने विधानसभा चुनावों के आंकड़ों के आधार पर अपनी दावेदारी मजबूत करना चाहती है। पार्टी की रणनीति में उन सीटों को प्राथमिकता देने की चर्चा है, जहां उसने लोकसभा चुनाव के दौरान बेहतर प्रदर्शन किया था या जहां उसके पास मजबूत स्थानीय चेहरे मौजूद हैं।
यही वजह है कि आगामी सीट बंटवारे में केवल कुल सीटों की संख्या ही नहीं, बल्कि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में दोनों दलों की ताकत भी अहम भूमिका निभा सकती है।
सीट बंटवारे पर इमरान मसूद ने क्या कहा?
कांग्रेस नेता इमरान मसूद से जब मीडिया रिपोर्टों में सपा को करीब 170 सीटों की सूची सौंपे जाने की चर्चा को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि यह पार्टी का मामला है और पार्टी ही इस पर फैसला करेगी। उन्होंने कहा कि वे अपनी पार्टी के लिए काम कर रहे हैं और कांग्रेस को मजबूत बनाना ही उनका लक्ष्य है।
उनके बयान से सीटों के बंटवारे पर किसी निश्चित आंकड़े की पुष्टि नहीं होती। फिलहाल कांग्रेस की ओर से चुनावी तैयारी और संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है, जबकि गठबंधन में सीटों की वास्तविक संख्या पर अंतिम सहमति सामने आना बाकी है।
क्या सपा-कांग्रेस गठबंधन में बढ़ेगी खींचतान?
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के सामने दोहरी चुनौती है। उन्हें भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति तैयार करनी है और साथ ही अपने-अपने राजनीतिक हितों का भी ध्यान रखना है। कांग्रेस अधिक सीटों पर चुनाव लड़कर अपना संगठन मजबूत करना चाहेगी, जबकि सपा सीटों के बंटवारे में अपने चुनावी आधार और जीत की संभावना को प्राथमिकता दे सकती है।
ऐसे में 200 सीटों पर कांग्रेस की तैयारी को गठबंधन की अंतिम मांग मानने के बजाय इसे शुरुआती राजनीतिक रणनीति के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा। असली तस्वीर तब साफ होगी, जब दोनों दल औपचारिक बातचीत के बाद सीटों की संख्या और विधानसभा क्षेत्रों पर सहमति बनाएंगे।
फिलहाल सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कांग्रेस कितनी सीटें मांगेगी, बल्कि यह भी है कि सपा और कांग्रेस अपने राजनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाकर गठबंधन को किस रूप में आगे बढ़ाती हैं।