खामेनेई की मौत और सैन्य ठिकानों पर हमलों के बाद भी नहीं टूटा ईरान का सत्ता तंत्र, अब अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रंप को झटका और इजराइल में बहुमत से दूर रह गया नेतन्याहू का गठबंधन
नई दिल्ली। ईरान की सत्ता बदलने का सपना लेकर अमेरिका और इजराइल ने फरवरी 2026 में बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को उम्मीद थी कि सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत और सैन्य ठिकानों पर लगातार हमलों के बाद ईरान की राजनीतिक व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी। जनता सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरेगी और 1979 से कायम इस्लामिक शासन के अंत का रास्ता खुल जाएगा।
लेकिन सैन्य ताकत के दम पर सत्ता परिवर्तन की यह रणनीति उम्मीद के मुताबिक कामयाब नहीं हुई। खामेनेई की मौत के बावजूद ईरान का राजनीतिक और संस्थागत ढांचा कायम रहा। ट्रंप ने ईरान के लोगों से अपनी सरकार के खिलाफ उठ खड़े होने और सत्ता अपने हाथ में लेने की अपील तक की थी। नेतन्याहू ने भी ईरानी जनता से सड़कों पर उतरकर व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई पूरी करने का आह्वान किया था।
अब इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू सामने आ रहा है। ईरान में सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाने वाले ट्रंप और नेतन्याहू को अपने ही देशों में राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका में 3 नवंबर के मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने कांग्रेस के दोनों सदनों में बढ़त हासिल कर ली है, वहीं इजराइल में नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत के आंकड़े से आठ सीट पीछे रह गया है।
ईरान में खामेनेई की मौत के बाद भी क्यों नहीं बदली सत्ता?
ईरान के मामले में अमेरिका और इजराइल की रणनीति की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही कि नेतृत्व को खत्म करने और पूरी राजनीतिक व्यवस्था को बदलने के बीच के अंतर को नजरअंदाज किया गया।
ईरान की सत्ता केवल सर्वोच्च नेता के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। इसके पीछे धार्मिक संस्थाओं, सुरक्षा एजेंसियों, सैन्य नेतृत्व और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का मजबूत नेटवर्क काम करता है।
यही वजह है कि 28 फरवरी 2026 को अमेरिकी और इजराइली हमलों में खामेनेई की मौत और कई वरिष्ठ अधिकारियों के मारे जाने के बाद भी ईरान की व्यवस्था तत्काल नहीं टूटी। देश में सत्ता के संचालन के लिए मौजूद संस्थागत ढांचे ने नेतृत्व के संकट के बीच भी अपनी भूमिका जारी रखी।
ट्रंप और नेतन्याहू ने सत्ता परिवर्तन के लिए क्या-क्या किया?
ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश केवल सैन्य हमलों तक सीमित नहीं थी। इसके लिए राजनीतिक, कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की भी रणनीति अपनाई गई।
1. विरोध प्रदर्शनों को सत्ता परिवर्तन का मौका माना
जनवरी 2026 में ईरान में हुए विरोध प्रदर्शनों को ट्रंप प्रशासन ने वहां की सरकार पर दबाव बढ़ाने के अवसर के रूप में देखा। प्रदर्शनकारियों के समर्थन और ईरानी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के विकल्पों पर भी विचार किया गया।
2. खामेनेई और शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमले किए। इस अभियान में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मारे गए। इसके बाद दोनों नेताओं ने ईरानी जनता से मौजूदा शासन के खिलाफ खड़े होने की अपील की।
3. ईरान के सुरक्षा तंत्र को कमजोर करने की कोशिश
सैन्य ठिकानों के अलावा सुरक्षा बलों और सरकार की सैन्य क्षमताओं को भी निशाना बनाया गया। मकसद ईरानी शासन की विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने और अपनी सत्ता बचाए रखने की क्षमता को कमजोर करना था।
4. रजा पहलवी को संभावित विकल्प के तौर पर देखा
ईरान के आखिरी शाह के बेटे रजा पहलवी को संभावित वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में भी चर्चा में रखा गया। हालांकि, ईरान के भीतर उनके वास्तविक जनसमर्थन और सत्ता संभालने की क्षमता को लेकर सवाल बने रहे।
अमेरिका में ट्रंप को मिडटर्म चुनाव में बड़ा झटका
ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के बीच ट्रंप के सामने अब घरेलू राजनीति की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। 3 नवंबर 2026 को हुए अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) और सीनेट दोनों में बढ़त हासिल कर ली है।
यह नतीजा ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। अब कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने से ट्रंप के लिए अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा।
इसके अलावा, विपक्षी पार्टी को प्रशासन के फैसलों की जांच करने, सरकारी नीतियों पर सवाल उठाने और राष्ट्रपति के प्रस्तावों को रोकने की अधिक ताकत मिल जाएगी।
महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत, सरकारी कामकाज और ईरान युद्ध को लेकर मतदाताओं की नाराजगी भी चुनावी नतीजों में अहम कारक बनकर सामने आई है।
हालांकि, मिडटर्म चुनाव में हार का मतलब ट्रंप का राष्ट्रपति पद तत्काल खत्म होना नहीं है। उनका कार्यकाल जारी रहेगा, लेकिन कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने से उनके सामने राजनीतिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
इजराइल में भी नेतन्याहू के लिए आसान नहीं सत्ता की राह
अमेरिका की तरह इजराइल में भी नेतन्याहू के सामने राजनीतिक संकट गहराता दिखाई दे रहा है। 27 अक्टूबर 2026 को हुए संसदीय चुनाव में उनकी अगुवाई वाले गठबंधन को 120 सदस्यीय नेसेट में 53 सीटें मिलीं। सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है।
दूसरी तरफ, गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिलीं, जबकि अरब दलों के खाते में 19 सीटें गईं। इस तरह किसी भी बड़े खेमे को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला।
3 नवंबर को विपक्षी दलों ने पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन देने की दिशा में कदम बढ़ाया। हालांकि, अलग-अलग विपक्षी दलों के बीच गठबंधन को लेकर मतभेद और अरब दलों के समर्थन का सवाल सरकार गठन की राह को जटिल बना रहा है।
नेतन्याहू का गठबंधन सबसे बड़े खेमे के रूप में सामने आने के बावजूद बहुमत से आठ सीट दूर है। ऐसे में उनकी राजनीतिक वापसी की राह आसान नहीं दिख रही।
ईरान युद्ध का राजनीतिक हिसाब अब अपने घर में दे रहे दोनों नेता
पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस सैन्य अभियान के जरिए ट्रंप और नेतन्याहू ईरान की सत्ता बदलने की उम्मीद कर रहे थे, उसका राजनीतिक फायदा उन्हें अपने देशों में क्यों नहीं मिल पाया?
ईरान में नेतृत्व को बड़ा नुकसान पहुंचाने के बावजूद वहां की राजनीतिक व्यवस्था कायम रही। दूसरी तरफ, अमेरिका में चुनावी नतीजों ने ट्रंप की राजनीतिक ताकत को सीमित कर दिया है और इजराइल में नेतन्याहू के सामने सरकार गठन की चुनौती खड़ी हो गई है।
हालांकि, दोनों देशों के चुनावी नतीजों को केवल ईरान युद्ध का परिणाम मानना सही नहीं होगा। महंगाई, घरेलू नीतियां, नेतृत्व की लोकप्रियता और अन्य राजनीतिक मुद्दों ने भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित किया है।
फिलहाल इतना साफ है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश के बाद ट्रंप और नेतन्याहू दोनों को अपने-अपने देशों में नई राजनीतिक चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। अब देखना होगा कि ईरान के मोर्चे पर अधूरी रही रणनीति का असर आने वाले दिनों में दोनों नेताओं की राजनीतिक स्थिति पर कितना गहरा पड़ता है।