दुबई/वॉशिंगटन। मध्य-पूर्व में शांति की उम्मीदों को एक बड़ा झटका लगा है। सामरिक रूप से संवेदनशील हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अमेरिकी नौसेना ने ईरान के विशालकाय कंटेनर जहाज ‘टुस्का’ (Tuska) को बलपूर्वक अपने नियंत्रण में ले लिया है। इस सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों देशों के बीच महज 12 दिन पहले हुआ युद्धविराम अब टूटने की कगार पर पहुँच गया है।
हाई-वोल्टेज ड्रामा: 6 घंटे की चेतावनी और फिर फायरिंग
रविवार को हुई इस घटना ने समुद्र में युद्ध जैसे हालात पैदा कर दिए। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, USS स्प्रुअंस युद्धपोत ने ईरानी जहाज टुस्का को रोकने के लिए कई घंटों तक रेडियो संदेश भेजे।
चेतावनी का दौर: करीब 6 घंटे तक लगातार चेतावनी दी गई, लेकिन ‘टुस्का’ ने अपना रास्ता नहीं बदला।
फायरिंग: जब जहाज बंदर अब्बास बंदरगाह की ओर बढ़ता रहा, तो अमेरिकी युद्धपोत ने अपनी 5-इंच MK 45 गन से टुस्का के इंजन रूम को निशाना बनाया।
कब्जा: इंजन ठप होने के बाद, अमेरिकी मरीन कमांडो ने हेलिकॉप्टर और नावों के जरिए जहाज पर धावा बोला और उसे अपने कब्जे में ले लिया।
नाकेबंदी या समुद्री डकैती? दावों में उलझा विवाद
अमेरिका ने इस कार्रवाई को अपनी ‘समुद्री नाकेबंदी’ का हिस्सा बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका अब तक ईरान के करीब 25 जहाजों को वापस खदेड़ चुका है।
ईरान का कड़ा रुख: तेहरान ने इस घटना को “समुद्री डकैती” करार दिया है। ईरानी सेना का कहना है कि यह सीधे तौर पर सीजफायर का उल्लंघन है और वे इसका “मुंहतोड़ जवाब” देने के लिए तैयार हैं।
शांति वार्ता पर संकट के बादल
यह टकराव ऐसे समय में हुआ है जब दोनों देश 22 अप्रैल तक के आधिकारिक युद्धविराम पर सहमत थे।इस्लामाबाद वार्ता: 12 अप्रैल को पाकिस्तान में पहले दौर की शांति वार्ता हुई थी।
अगले दौर की बातचीत के लिए अमेरिका ने डेलिगेशन भेजने की तैयारी की थी, लेकिन ईरान ने अब साफ कर दिया है कि जब तक समुद्री नाकेबंदी नहीं हटती, वह टेबल पर नहीं लौटेगा।
टुस्का: समुद्र का ‘दानव’ अब अमेरिकी कैद में
पकड़ा गया जहाज ‘टुस्का’ कोई साधारण जहाज नहीं है। इसकी विशालता का अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है:
- लंबाई: 294 मीटर (करीब 3 फुटबॉल मैदानों के बराबर)।
- सफर: यह 8 दिन पहले मलेशिया के पोर्ट क्लांग से रवाना हुआ था।
- गंतव्य: ईरान का मुख्य बंदरगाह, बंदर अब्बास।
फिलहाल यह विशाल जहाज अमेरिकी सेना के नियंत्रण में है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि कूटनीतिक रास्ते तुरंत नहीं खुले, तो खाड़ी देशों में एक बार फिर बड़े सैन्य संघर्ष की शुरुआत हो सकती है।