नई दिल्ली: जून की शुरुआत होते ही देशभर में मानसून को लेकर चर्चा तेज हो जाती है। भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए लोग बारिश का इंतजार करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत में केवल एक ही मानसून नहीं होता। मौसम विज्ञान के अनुसार, अलग-अलग समय पर सक्रिय होने वाली कई मौसमी प्रणालियां देश के विभिन्न हिस्सों में बारिश कराती हैं।
आमतौर पर लोग मानसून को सिर्फ बारिश से जोड़कर देखते हैं, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से मानसून हवा की दिशा में होने वाला मौसमी बदलाव है। जमीन और समुद्र के तापमान में अंतर के कारण हवाओं की दिशा बदलती है, जिससे अलग-अलग प्रकार के मानसून और वर्षा प्रणालियां बनती हैं।
क्या होता है मानसून और कैसे करता है असर?
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, जब गर्मियों और सर्दियों में धरती और समुद्र अलग-अलग गति से गर्म या ठंडे होते हैं, तब वायुदाब में बदलाव आता है। इसी वजह से हवाओं की दिशा बदलती है और मानसूनी प्रणालियां विकसित होती हैं। यही बदलाव देश के अलग-अलग क्षेत्रों में वर्षा का कारण बनता है।
साउथ-वेस्ट मानसून: देश की बारिश की लाइफलाइन
भारत में होने वाली कुल वर्षा का लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून से मिलता है। यह मानसून आमतौर पर जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है और देश की कृषि व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।
जब भारतीय उपमहाद्वीप गर्म होता है तो उत्तर भारत में निम्न दबाव का क्षेत्र बनता है। इसके विपरीत हिंद महासागर अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। इस स्थिति में समुद्र से नमी से भरी हवाएं भारत की ओर बढ़ती हैं और व्यापक बारिश कराती हैं।
अरब सागर शाखा कैसे कराती है बारिश?
दक्षिण-पश्चिम मानसून की पहली शाखा अरब सागर से होकर भारत में प्रवेश करती है। इसका पहला पड़ाव केरल होता है। इसके बाद यह कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों तक पहुंचती है।
पश्चिमी घाट की पर्वत श्रृंखला से टकराने के बाद नमी से भरी हवाएं ऊपर उठती हैं और भारी वर्षा होती है। यही कारण है कि केरल, कोंकण, मुंबई और पश्चिमी घाट के आसपास के क्षेत्रों में खूब बारिश देखने को मिलती है। हालांकि पहाड़ों के दूसरी ओर स्थित कुछ अंदरूनी इलाकों में वर्षा अपेक्षाकृत कम होती है।
बंगाल की खाड़ी शाखा की क्या है भूमिका?
दक्षिण-पश्चिम मानसून की दूसरी प्रमुख शाखा बंगाल की खाड़ी से आती है। यह अंडमान-निकोबार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा से आगे बढ़ते हुए बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों में बारिश कराती है।
हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखला इन हवाओं को आगे बढ़ने से रोकती है, जिससे मैदानी इलाकों में भारी वर्षा होती है। बाद में उत्तर भारत में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की दोनों शाखाएं मिलकर पंजाब, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर तक बारिश पहुंचाती हैं।
उत्तर-पूर्व मानसून कब होता है सक्रिय?
सितंबर के अंत और अक्टूबर से दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ने लगता है। इसके बाद हवाओं की दिशा बदल जाती है और उत्तर-पूर्व मानसून सक्रिय हो जाता है।
इस दौरान हवाएं उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा से समुद्र की ओर बहती हैं। बंगाल की खाड़ी से गुजरते समय ये दोबारा नमी हासिल कर लेती हैं और तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत के कई हिस्सों में अच्छी बारिश कराती हैं।
दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु के लिए यह मानसून बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि जून से सितंबर के दौरान वहां अपेक्षाकृत कम वर्षा होती है। अक्टूबर से दिसंबर के बीच उत्तर-पूर्व मानसून वहां बारिश की बड़ी जरूरत पूरी करता है।
प्री-मानसून क्यों माना जाता है खास?
मार्च से मई के बीच का समय प्री-मानसून कहलाता है। इस दौरान उत्तर भारत में धूल भरी आंधियां, गरज-चमक और हल्की बारिश देखने को मिलती है।
मौसम विशेषज्ञ इसे मानसून के आगमन का संकेत मानते हैं। खेती-किसानी के लिहाज से भी प्री-मानसून की बारिश महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे खेतों में नमी बढ़ती है और तापमान में गिरावट आती है।
सर्दियों में बारिश कौन कराता है?
जनवरी और फरवरी के दौरान होने वाली बारिश शीतकालीन मानसून या पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से होती है। भूमध्यसागर क्षेत्र में बनने वाले पश्चिमी विक्षोभ उत्तर भारत तक पहुंचते हैं और पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान समेत कई राज्यों में वर्षा कराते हैं।
यह बारिश रबी फसलों के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती है और गेहूं जैसी फसलों की पैदावार बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है।