नई दिल्ली: रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। दावा किया जा रहा है कि रूस की ओर से लड़ने वाली कुछ टुकड़ियों में ऐसे यूक्रेनी सैनिक भी शामिल हैं, जो कभी यूक्रेन की सेना का हिस्सा थे और युद्ध के दौरान रूस के कब्जे में आ गए थे। इन सैनिकों को यूक्रेनी वॉलंटियर नाम दिया गया है। आरोप है कि कुछ युद्धबंदियों ने रूस की कैद और कथित प्रताड़ना से बचने के लिए मजबूरी में रूसी पक्ष से लड़ने का रास्ता चुना।
इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा मैक्सिम क्रिवोनोस बटालियन की हो रही है। जर्मन मीडिया संस्थान डीडब्ल्यू की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस बटालियन में शामिल कुछ यूक्रेनी सैनिकों ने रूस की सेना का साथ अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि हालातों के दबाव में चुना।
कैसे यूक्रेनी सैनिक पावलो ओलिनिक पहुंचे रूस की सेना तक?
रिपोर्ट में यूक्रेन के पूर्व सैनिक पावलो ओलिनिक की कहानी का जिक्र किया गया है। ओलिनिक यूक्रेन के वोलिन क्षेत्र के रहने वाले हैं और रूसी सेना के कब्जे में आने से पहले यूक्रेनी सेना की 101वीं ब्रिगेड में वरिष्ठ लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात थे।
अक्टूबर 2024 में डोनबास इलाके में रूसी सेना के साथ हुई लड़ाई के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। ओलिनिक के मुताबिक, रूस की कैद में उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उन्होंने बिजली के झटके दिए जाने का भी दावा किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कैद के दौरान उन्हें मैक्सिम क्रिवोनोस बटालियन में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया। ओलिनिक का कहना है कि उन्होंने शुरुआत में इस प्रस्ताव को तीन बार ठुकराया, लेकिन बाद में रूस की कैद से निकलने के लिए इसे स्वीकार कर लिया।
उनके मुताबिक, उनका मकसद यूक्रेन के खिलाफ लड़ना नहीं था, बल्कि कैद से बाहर निकलने का रास्ता तलाशना था।
मैक्सिम क्रिवोनोस बटालियन क्या है?
रिपोर्ट के अनुसार, रूस ने साल 2022 में यूक्रेनी युद्धबंदियों और पूर्व सैनिकों को शामिल करके ऐसी बटालियनों का गठन शुरू किया था। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा मैक्सिम क्रिवोनोस बटालियन की हुई।
इस बटालियन का नाम 17वीं सदी के कोसैक कमांडर मैक्सिम क्रिवोनोस के नाम पर रखा गया है। हालांकि, इसमें कितने सैनिक शामिल हैं, इसकी आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
रूस की ओर से इन सैनिकों को यूक्रेन के खिलाफ इस्तेमाल करने की रणनीति को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी टुकड़ियां सिर्फ सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक संदेश देने के लिए भी बनाई जा सकती हैं।
रूस ने यूक्रेनी सैनिकों को अलग-अलग बटालियनों में क्यों शामिल किया?
डीडब्ल्यू की रिपोर्ट में रक्षा विशेषज्ञ पावेल लुज़िन के हवाले से कहा गया है कि यह कदम रूस की व्यापक सैन्य रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, पहले यह सामने आया था कि यूक्रेन की ओर से रूस के कुछ नागरिक भी युद्ध में शामिल होकर लड़ रहे हैं। ऐसे में रूस के लिए यह एक बड़ी चुनौती थी कि यूक्रेन की तरफ से रूसी नागरिक हथियार उठा रहे हैं, जबकि रूस की तरफ से यूक्रेनी नागरिकों की भागीदारी कम दिखाई दे रही थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि रूस ने इसी अंतर को कम करने के लिए यूक्रेनी नागरिकों और पूर्व सैनिकों वाली टुकड़ियों का इस्तेमाल शुरू किया हो सकता है।
यूक्रेन की ओर से भी लड़ रहे रूस के नागरिक
रूस-यूक्रेन युद्ध में दोनों पक्षों की सेनाओं के अलावा विदेशी और दूसरे देशों के नागरिकों की भागीदारी भी सामने आती रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन की ओर से भी रूस के कुछ नागरिक लड़ रहे हैं। यही वजह बताई जा रही है कि रूस ने यूक्रेनी सैनिकों को अपनी ओर शामिल करने की नीति अपनाई।
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया को लेकर मानवाधिकार संगठनों और विशेषज्ञों ने कई सवाल उठाए हैं।
क्या युद्धबंदियों पर बनाया जा रहा है दबाव?
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में बातचीत किए गए बड़ी संख्या में युद्धबंदियों ने रूसी हिरासत के दौरान कथित प्रताड़ना की जानकारी दी थी। इनमें बिजली के झटके देने जैसे गंभीर आरोप भी शामिल थे।
अंतरराष्ट्रीय न्याय और जवाबदेही आयोग के कार्यकारी निदेशक बिल वाइली ने रूस से लौटे सैनिकों के अनुभवों के आधार पर सवाल उठाए थे कि क्या यूक्रेनी सैनिकों पर रूसी सेना में शामिल होने का दबाव बनाया जा रहा है।
हालांकि, रूस की ओर से ऐसे आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया दी गई, इसकी जानकारी इस रिपोर्ट में नहीं दी गई है।
रूस को इन सैनिकों पर भरोसा कैसे रहता है?
पावलो ओलिनिक के मुताबिक, मैक्सिम क्रिवोनोस बटालियन में शामिल यूक्रेनी सैनिकों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है।
उनका दावा है कि इन सैनिकों को एक निजी सैन्य व्यवस्था के तहत रखा जाता है और उन्हें मासिक वेतन दिया जाता है। उन्हें मोबाइल फोन भी दिए गए हैं, लेकिन निगरानी इतनी सख्त है कि वे यूक्रेन में किसी से संपर्क करने से भी डरते हैं।
ओलिनिक के अनुसार, वह मार्च 2025 में किसी तरह वहां से निकलने में सफल रहे। उनका कहना है कि रूसी सेना में शामिल होने का उनका मकसद लड़ाई करना नहीं, बल्कि कैद से बाहर निकलना था।