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75 साल की सत्ता पर उम्र का साया! चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से युवाओं का बढ़ा मोहभंग, शी जिनपिंग के सामने खड़ी हुई नई राजनीतिक चुनौती

बीजिंग: दुनिया के सामने अपनी राजनीतिक स्थिरता, अनुशासन और मजबूत शासन व्यवस्था का दावा करने वाला चीन अब एक ऐसे संकट से जूझ रहा है, जो सीधे उसकी सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के भविष्य से जुड़ा है। करीब 75 वर्षों से देश की सत्ता संभाल रही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीसीपी) के सामने अब दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक ओर तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी और घटती जन्मदर का दबाव है, वहीं दूसरी ओर युवा पीढ़ी का पार्टी से लगातार दूर होता रुझान नई चिंता बन गया है। यही वजह है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

10.1 करोड़ सदस्य, लेकिन सबसे धीमी रफ्तार से बढ़ी पार्टी

कम्युनिस्ट पार्टी के संगठन विभाग की ओर से जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 के अंत तक पार्टी की सदस्य संख्या लगभग 10.1 करोड़ (101 मिलियन) रही। सदस्य संख्या भले ही बड़ी दिखाई देती हो, लेकिन इसमें बढ़ोतरी की रफ्तार बेहद धीमी रही। पिछले वर्ष की तुलना में केवल एक प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिसे हाल के वर्षों की सबसे कमजोर बढ़ोतरी माना जा रहा है।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि वर्ष 2021 के बाद से पार्टी में नए सदस्यों को जोड़ने की गति लगातार कम होती गई है। यानी पार्टी का विस्तार जारी है, लेकिन पहले जैसी तेजी अब नहीं बची है।

युवाओं की जगह बुजुर्गों का बढ़ता दबदबा

सबसे ज्यादा चिंता पार्टी की बदलती आयु संरचना को लेकर है। मौजूदा समय में करीब 30 प्रतिशत सदस्य 61 वर्ष या उससे अधिक आयु के हैं, जो पिछले कई वर्षों में सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है।

इसके उलट 35 वर्ष या उससे कम उम्र के सदस्यों की हिस्सेदारी घटकर केवल 22 प्रतिशत रह गई है। कुछ वर्ष पहले तक यही आंकड़ा लगभग एक-चौथाई था। इससे संकेत मिलता है कि भविष्य में पार्टी की कमान संभालने वाली युवा पीढ़ी अपेक्षित संख्या में संगठन से नहीं जुड़ रही है।

नई भर्ती बढ़ी, फिर भी नहीं बदल रही तस्वीर

दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2025 में पार्टी में शामिल हुए नए सदस्यों में 80 प्रतिशत से अधिक की उम्र 35 वर्ष से कम थी। इसके बावजूद कुल सदस्यता में युवाओं का अनुपात नहीं बढ़ पाया।

विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी बड़ी वजह चीन की बदलती जनसंख्या संरचना है। बड़ी संख्या में पुराने सदस्य अब भी पार्टी का हिस्सा बने हुए हैं, लोगों की औसत जीवन प्रत्याशा लगातार बढ़ रही है और दूसरी ओर देश में युवाओं की संख्या घटती जा रही है। ऐसे में नई भर्ती भी उम्रदराज सदस्य आधार की भरपाई नहीं कर पा रही।

जनसंख्या संकट का असर अब राजनीति पर भी साफ

विशेषज्ञों का कहना है कि कम्युनिस्ट पार्टी की यह स्थिति चीन के व्यापक जनसंख्या संकट का ही प्रतिबिंब है। वर्षों से गिरती जन्मदर, लगातार चौथे साल कुल आबादी में कमी और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी ने देश के सामाजिक और आर्थिक ढांचे के साथ-साथ राजनीतिक व्यवस्था को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

कार्यबल में आने वाली नई पीढ़ी लगातार छोटी होती जा रही है। इसका असर केवल उद्योगों और अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक संस्था भी इससे अछूती नहीं बची है।

पार्टी का प्रतिशत बढ़ा, लेकिन वजह अलग निकली

पहली नजर में ऐसा लगता है कि चीन की कुल आबादी में कम्युनिस्ट पार्टी की हिस्सेदारी बढ़ी है। वर्ष 2021 में पार्टी सदस्य कुल आबादी का 6.85 प्रतिशत थे, जो 2025 तक बढ़कर 7.21 प्रतिशत हो गए।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे पार्टी का तेज विस्तार नहीं, बल्कि चीन की कुल आबादी में लगातार आई गिरावट बड़ी वजह है। यानी प्रतिशत बढ़ने का कारण सदस्य संख्या में विस्फोट नहीं, बल्कि देश की घटती आबादी है।

बुजुर्ग आबादी ने बढ़ाई सरकार की चिंता

चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय के जुलाई में जारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 के अंत तक देश में 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या 32.338 करोड़ तक पहुंच गई, जो कुल आबादी का लगभग 23 प्रतिशत है।

इसी तरह 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या 22.365 करोड़ रही, जो कुल आबादी का करीब 15.9 प्रतिशत है। वृद्धावस्था निर्भरता अनुपात 23.1 प्रतिशत दर्ज किया गया, जबकि औसत जीवन प्रत्याशा 79.25 वर्ष रही।

विशेषज्ञों ने भविष्य को लेकर जताई चिंता

जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का मानना है कि दशकों से घटती जन्मदर, पहले की बड़ी पीढ़ियों का तेजी से बुजुर्ग होना और जीवन प्रत्याशा में लगातार वृद्धि ने चीन को तेजी से वृद्ध समाज में बदल दिया है।

उनके अनुसार, इसका असर केवल अर्थव्यवस्था, रोजगार, उत्पादन क्षमता और सामाजिक ढांचे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य संरचना और भविष्य के राजनीतिक नेतृत्व पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में शी जिनपिंग के सामने चुनौती केवल आर्थिक मोर्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठनात्मक संतुलन और आने वाली पीढ़ी को पार्टी से जोड़कर रखने की भी है।

vineet verma

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