टोक्यो: कई वर्षों से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर पड़ रहा जापानी येन अब अचानक मजबूती दिखाने लगा है। बाजार में आई इस तेजी ने निवेशकों का ध्यान खींच लिया है। इसके पीछे अमेरिका और जापान के बीच बढ़ता आर्थिक तालमेल सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। हालिया कारोबारी सत्र में डॉलर के मुकाबले येन 157.40 के स्तर पर बंद हुआ, जो मई की शुरुआत के बाद इसकी सबसे मजबूत स्थिति है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अमेरिका जापानी मुद्रा को स्थिर रखने में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखा रहा है और इसके पीछे उसका क्या आर्थिक हित छिपा है?
कुछ ही दिन पहले जापानी येन डॉलर के मुकाबले इतना कमजोर हो गया था कि वह 1986 के बाद के सबसे निचले स्तर तक पहुंच गया। हालांकि इसके बाद बाजार में अचानक तेज रिकवरी देखने को मिली। जानकारों का मानना है कि यह सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि अमेरिका और जापान के बीच बनी नई आर्थिक समझ का असर है, जिसने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया।
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने महंगाई पर नियंत्रण के लिए ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखा। दूसरी ओर जापान लंबे समय तक नरम मौद्रिक नीति पर कायम रहा। दोनों देशों की ब्याज दरों के बीच बढ़े अंतर के कारण निवेशकों ने बेहतर रिटर्न के लिए डॉलर को प्राथमिकता दी। नतीजतन डॉलर मजबूत होता गया और जापानी येन लगातार दबाव में आता चला गया।
जापान अपनी ऊर्जा जरूरतों, कच्चे तेल और कई आवश्यक वस्तुओं के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में कमजोर मुद्रा का सीधा असर आयात लागत पर पड़ता है। इससे कंपनियों का खर्च बढ़ता है और आम उपभोक्ताओं पर भी महंगाई का बोझ बढ़ने लगता है। यही वजह है कि कमजोर येन जापान की अर्थव्यवस्था के लिए लगातार चिंता का विषय बना हुआ है।
हाल के दिनों में येन की मजबूती के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। बाजार में जापानी मुद्रा की खरीद बढ़ी, बड़े वित्तीय संस्थानों के साथ समन्वय हुआ और सबसे अहम भूमिका अमेरिका-जापान के बीच बने आर्थिक सहयोग की रही।
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट और जापान की वित्त मंत्री सात्सुकी कातायामा के बीच हुई बातचीत में दोनों देशों ने वित्तीय स्थिरता बनाए रखने पर सहमति जताई। इसी दौरान स्कॉट बेसेंट के नोटपैड पर ‘5 से 10 अरब डॉलर का जापानी येन खरीदना’ लिखा दिखाई दिया, जिससे संकेत मिला कि अमेरिका भी येन को स्थिर रखने के पक्ष में है।
पहली नजर में यह सहयोगी देश की मदद जैसा दिखता है, लेकिन इसके पीछे अमेरिका का अपना आर्थिक हित भी जुड़ा है। जापान अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स का दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है। उसके पास बड़ी मात्रा में अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स हैं।
जब जापान अपनी मुद्रा को मजबूत करना चाहता है तो वह विदेशी मुद्रा भंडार से अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स बेचकर डॉलर जुटाता है और उन डॉलर से बाजार में येन खरीदता है। इससे येन की मांग बढ़ती है और उसकी कीमत मजबूत होती है। लेकिन यदि जापान बड़े पैमाने पर अमेरिकी बॉन्ड्स बेचता है तो उसका सीधा असर अमेरिकी बॉन्ड बाजार पर पड़ता है।
अमेरिका पहले से ही बढ़ते सरकारी कर्ज और उसकी लागत की चुनौती झेल रहा है। हाल के महीनों में 30 वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड 5.2 प्रतिशत के पार पहुंच चुकी है, जो 2007 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है।
इसके अलावा अगले एक वर्ष के भीतर अमेरिका को अपने सरकारी कर्ज का करीब एक-तिहाई हिस्सा दोबारा रीफाइनेंस करना है। यदि इस दौरान बॉन्ड यील्ड और बढ़ती है तो सरकार को नए कर्ज पर कहीं अधिक ब्याज देना पड़ेगा। ऐसे में यदि जापान बड़े पैमाने पर अमेरिकी बॉन्ड बेचता है तो अमेरिका की आर्थिक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। यही कारण है कि अमेरिका भी नहीं चाहता कि येन में और बड़ी गिरावट आए।
जापानी येन वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की प्रमुख मुद्राओं में शामिल है। इसमें बड़ा उतार-चढ़ाव एशियाई शेयर बाजारों, विदेशी निवेश, कमोडिटी कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर असर डाल सकता है।
यदि अमेरिका और जापान मिलकर येन को स्थिर रखने में सफल रहते हैं तो वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता कम हो सकती है। साथ ही अमेरिकी बॉन्ड बाजार पर दबाव घटेगा और निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होगा।
अब निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि अमेरिका और जापान के बीच बनी यह सहमति कितनी प्रभावी साबित होती है। यदि जापान बड़े पैमाने पर अमेरिकी बॉन्ड्स की बिक्री से बचता है और दोनों देशों के बीच समन्वय बना रहता है तो आने वाले समय में येन और मजबूत हो सकता है। वहीं यदि वैश्विक आर्थिक हालात बिगड़ते हैं या डॉलर दोबारा तेजी पकड़ता है तो जापान के सामने अपनी मुद्रा को संभालने की चुनौती फिर खड़ी हो सकती है।
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