नई दिल्ली: लाल बहादुर शास्त्री का सार्वजनिक जीवन सादगी, नैतिकता और दृढ़ फैसलों की मिसाल रहा। मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक, उन्होंने अपने छोटे से कार्यकाल में ऐसे कई निर्णय लिए, जिनकी चर्चा आज भी होती है। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित शास्त्री ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और बाद में सार्वजनिक जीवन में भी उन्हीं सिद्धांतों को अपनाने की कोशिश की।
आर्थिक रूप से साधारण परिवार में पले-बढ़े शास्त्री ने अभावों के बीच शिक्षा हासिल की। सत्ता के शीर्ष पद तक पहुंचने के बाद भी उनकी जीवनशैली में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भले ही करीब 19 महीने का रहा, लेकिन इस दौरान लिए गए कई फैसलों ने उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक शैली की अलग पहचान बनाई।
रेल हादसे के बाद बिना मांग के दे दिया इस्तीफा
1956 में महबूबनगर और उसके बाद अरियालूर में हुए रेल हादसों ने तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को गहराई से प्रभावित किया। अरियालूर दुर्घटना में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई थी। हादसे के बाद शास्त्री ने इसकी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
खास बात यह थी कि उनके इस्तीफे की मांग नहीं की गई थी। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी उनके इस्तीफे के पक्ष में नहीं थे। इसके बावजूद शास्त्री अपने फैसले पर कायम रहे। उनका मानना था कि किसी मंत्रालय में हुई बड़ी विफलता की राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी मंत्री से अलग नहीं की जा सकती।
प्रधानमंत्री बने तो साफ कर दिया- फैसले खुद लेंगे
कामराज योजना के दौरान नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने वाले नेताओं में शास्त्री भी शामिल थे। बाद में वह बिना विभाग के मंत्री के तौर पर सरकार में लौटे। 27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद कांग्रेस के भीतर प्रधानमंत्री पद को लेकर चर्चा हुई और के. कामराज के नेतृत्व वाले धड़े ने लाल बहादुर शास्त्री के नाम को आगे बढ़ाया। 9 जून 1964 को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्री ने अपनी कार्यशैली को लेकर जल्द ही स्पष्ट संकेत दे दिए। जिन लोगों ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में भूमिका निभाई थी, उनके प्रभाव में काम करने के बजाय उन्होंने मंत्रियों और विभागों के चयन में अपने निर्णय को प्राथमिकता दी।
विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी अनुभवी नेता सरदार स्वर्ण सिंह को दी गई। वहीं इंदिरा गांधी को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सौंपा गया। इससे नई सरकार में शास्त्री की अपनी राजनीतिक कार्यशैली का संकेत मिला।
अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुके शास्त्री
1965 में जब शास्त्री प्रधानमंत्री थे, तब 1962 के भारत-चीन युद्ध की हार को ज्यादा समय नहीं बीता था। सीमा पर तनाव के बीच पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी रुख भारत के लिए एक अलग चुनौती बना हुआ था।
अमेरिकी राजदूत चेस्टर बाउल्स के जरिए राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने शास्त्री को अमेरिका आने का निमंत्रण दिया था, लेकिन बाद में यह निमंत्रण वापस ले लिया गया। इसके बाद कनाडा की यात्रा के दौरान जॉनसन ने शास्त्री से वाशिंगटन में रुकने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया।
शास्त्री ने अमेरिका के बजाय सोवियत संघ की यात्रा की। उस समय भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था और अमेरिका की ओर से गेहूं की आपूर्ति रोकने की धमकी भी सामने आई थी। इसके बावजूद शास्त्री दबाव में झुकने के बजाय देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने पर जोर देते रहे।
पहले खुद अपनाया उपवास, फिर देश से की अपील
खाद्यान्न संकट के बीच शास्त्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की। खास बात यह रही कि उन्होंने जनता से यह आग्रह करने से पहले इसे अपने परिवार में लागू किया।
उनकी अपील का व्यापक असर हुआ। कई परिवारों ने इसमें भाग लिया और होटल-रेस्तरां संचालकों ने भी सप्ताह में एक शाम अपना कारोबार बंद रखना शुरू किया। शास्त्री का मानना था कि केवल अपील करने के बजाय नेतृत्व को खुद उदाहरण पेश करना चाहिए।
इसी दौर में उन्होंने आर्थिक आत्मनिर्भरता और कृषि उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया। देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए हरित क्रांति और दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की दिशा में पहल हुई। इसी दौर में उनका प्रसिद्ध नारा ‘जय जवान, जय किसान’ देशभर में गूंजा।
कड़े प्रशासनिक फैसलों से अपनी ही पार्टी को चौंकाया
प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्री ने ऐसे प्रशासनिक फैसले भी लिए, जिनसे सत्ता के भीतर कई लोगों को आश्चर्य हुआ। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो के खिलाफ एस.आर. दास आयोग की रिपोर्ट में आर्थिक अनियमितताओं और पद के दुरुपयोग से जुड़े आरोप सामने आए थे। शास्त्री ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा और आखिरकार कैरो को पद छोड़ना पड़ा।
वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णामचारी को भी अपने खिलाफ जांच के मामले में पद गंवाना पड़ा। शास्त्री के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ संस्थागत स्तर पर भी कदम उठाए गए। वरिष्ठ कांग्रेस नेता के. संथनम की अध्यक्षता में इस मुद्दे पर समिति बनाई गई। गृह मंत्रालय के स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट को आगे चलकर केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई के रूप में संगठित किया गया।
1965 में पाकिस्तान के खिलाफ लिया बड़ा सैन्य फैसला
1962 में चीन के हाथों मिली हार के बाद पाकिस्तान के हौसले बढ़े हुए थे। 1 सितंबर 1965 को पाकिस्तान ने कश्मीर के अखनूर-जम्मू सेक्टर में हमला किया। इसके बाद शास्त्री ने सेना को पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करके पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा खोलने की अनुमति दी।
6 सितंबर को भारतीय सेना ने अमृतसर, फिरोजपुर और गुरुदासपुर की ओर से हमला किया। इसके बाद सियालकोट का मोर्चा भी खोला गया। युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्तान के अमेरिकी पैटन टैंकों समेत कई सैन्य संसाधनों को निशाना बनाया। 23 सितंबर 1965 को दोनों देशों ने युद्धविराम की घोषणा कर दी।
ताशकंद में समझौता, फिर हमेशा के लिए खामोश हो गई आवाज
1965 के युद्ध के बाद भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के बाद भारत और पाकिस्तान की सेनाओं को युद्ध से पहले की स्थिति में लौटने की दिशा में कदम उठाने पड़े। अमेरिका और सोवियत संघ भी इस प्रक्रिया में सक्रिय रहे।
इसी दबाव के बीच शास्त्री ताशकंद वार्ता में शामिल हुए। 10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते पर सहमति बनी। इसके तहत दोनों देशों ने 25 फरवरी 1966 तक 5 अगस्त 1965 से पहले की स्थिति में लौटने और युद्धविराम की शर्तों का पालन करने पर सहमति जताई।
लेकिन समझौते के कुछ ही घंटों बाद शास्त्री की तबीयत अचानक बिगड़ गई। रात करीब 1:20 बजे वह अपने सेवक जगन्नाथ के कमरे तक पहुंचे और डॉक्टर को बुलाने के लिए कहा। उन्हें बिस्तर तक पहुंचाया गया और डॉक्टर चुग ने उनका इलाज करने की कोशिश की, लेकिन इंजेक्शन का असर नहीं हुआ। कुछ ही देर में लाल बहादुर शास्त्री की सांसें थम गईं।