नई दिल्ली: जंगल सफारी में बाघ की एक झलक पाने की चाह हर पर्यटक की होती है। लेकिन बाघ का दिखना केवल किस्मत पर निर्भर नहीं होता। जंगल को करीब से समझने वाले नेचुरलिस्ट आसपास के जानवरों के व्यवहार, उनकी आवाजों, पगमार्क और पानी के स्रोतों जैसी गतिविधियों से काफी हद तक अंदाजा लगा लेते हैं कि इलाके में बाघ की मौजूदगी हो सकती है। हालांकि इन संकेतों का मतलब यह नहीं होता कि बाघ उसी जगह मौजूद है, बल्कि कई संकेतों को एक साथ समझकर संभावित स्थिति का अनुमान लगाया जाता है।
मानसून के बाद देश के कई प्रमुख वन्यजीव पर्यटन स्थल एक बार फिर सफारी के लिए खुलने लगते हैं। राजस्थान के रणथंभौर और सरिस्का टाइगर रिजर्व से लेकर उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क तक पर्यटकों की आवाजाही बढ़ जाती है। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि क्या जंगल में बाघ के नजर आने वाली जगह का पहले से अनुमान लगाया जा सकता है।
जंगल में मौजूद मिट्टी, पेड़-पौधे, पक्षी और दूसरे जानवरों की गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। इन्हीं बदलावों को पढ़कर अनुभवी नेचुरलिस्ट बाघ की संभावित मौजूदगी का अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं।
जानवरों की आवाजें देती हैं बड़ा संकेत
कैनाइन बिहेवियरिस्ट और वाइल्डलाइफ एंथूजियास्ट स्वाति टंडन ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि जंगल में बाघ की मौजूदगी से आसपास के जानवरों के व्यवहार में बदलाव आ सकता है। उनकी आवाजें बाघ की मौजूदगी का संकेत समझने में मदद करती हैं।
मिसाल के तौर पर पहले लंगूर तेज आवाज में प्रतिक्रिया दे सकते हैं और उसके बाद सांभर या चीतल की अलार्म कॉल सुनाई दे सकती है। मोर, गिलहरी और दूसरे पक्षी भी शिकारी की मौजूदगी महसूस होने पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं। इसलिए नेचुरलिस्ट बाघ की तलाश में केवल आंखों से आसपास नहीं देखते, बल्कि जंगल की आवाजों को भी ध्यान से सुनते हैं।
सांभर की अलार्म कॉल पर क्यों रहती है खास नजर
बाघ को ट्रैक करते समय अलग-अलग जानवरों की अलार्म कॉल को पहचानना महत्वपूर्ण माना जाता है। हर जानवर की आवाज और उसकी प्रतिक्रिया का मतलब एक जैसा नहीं होता।
Pugdundee Safaris के डायरेक्टर मानव खंडूजा के मुताबिक, सांभर की अलार्म कॉल और लगातार सुनाई देने वाली प्रतिक्रिया इस बात का संकेत हो सकती है कि आसपास बाघ होने की संभावना है। नेचुरलिस्ट यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि बाघ किसी जगह पर रुका हुआ है या लगातार आगे बढ़ रहा है।
हालांकि सिर्फ किसी जानवर की आवाज सुनकर यह तय नहीं किया जा सकता कि बाघ ठीक उसी स्थान पर है। अनुभवी नेचुरलिस्ट आवाज की दिशा, उसकी लगातार प्रतिक्रिया और आसपास मौजूद दूसरे संकेतों को भी साथ में देखते हैं।
पगमार्क से मिलती है हाल की गतिविधि की जानकारी
जंगल में जानवरों के पैरों के निशान यानी पगमार्क भी अहम संकेत माने जाते हैं। रास्ते पर मिले ताजा निशान इस बात का अंदाजा लगाने में मदद कर सकते हैं कि कोई बड़ा जानवर हाल में वहां से गुजरा है।
इसके अलावा नेचुरलिस्ट जंगल की पगडंडियों पर जानवरों की आवाजाही और आसपास के रास्तों को भी देखते हैं। इन संकेतों को इलाके में मौजूद पानी के स्रोतों से जोड़कर बाघ की संभावित गतिविधि को समझने की कोशिश की जाती है।
जलस्रोतों के आसपास भी रहती है नजर
जंगल में पानी सभी जानवरों के लिए जरूरी होता है। यही वजह है कि तालाब, झील और दूसरे जलस्रोत सफारी के दौरान महत्वपूर्ण स्थान बन जाते हैं।
लेकिन पानी के स्रोत के पास पहुंचने का मतलब यह नहीं है कि वहां बाघ जरूर दिखाई देगा। बाघ आसपास की परिस्थितियों और अपने व्यवहार के अनुसार अपनी जगह बदल सकता है। इसलिए नेचुरलिस्ट केवल जलस्रोत पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि उसके आसपास के जंगल और दूसरे जानवरों की गतिविधियों पर भी नजर रखते हैं।
संकेत मिलें तो भी नहीं की जाती जल्दबाजी
अगर किसी इलाके में बाघ की मौजूदगी के संकेत मिल जाएं तो सफारी वाहन को तुरंत उसी दिशा में दौड़ा देना सही तरीका नहीं माना जाता। जंगल में बाघ को तलाशने के दौरान धैर्य और शांति जरूरी होती है।
स्वाति टंडन के मुताबिक, ऐसे स्थान पर पहुंचने के बाद शांत रहना, ध्यान से देखना और सुनना तथा जंगल का सम्मान करना जरूरी है। कई बार वाहन की आवाज से बाघ सतर्क होकर छिप सकता है। वह उसी जगह आराम कर सकता है या अपनी सामान्य गतिविधि बदल सकता है।
इसीलिए अनुभवी नेचुरलिस्ट हालात को देखकर तय करते हैं कि किसी स्थान पर रुककर इंतजार करना बेहतर होगा या आगे बढ़ना चाहिए।
हर सफारी में बाघ दिखे, यह जरूरी नहीं
सफारी पर जाने वाले लोगों की सबसे बड़ी उम्मीद बाघ को करीब से देखना होती है, लेकिन जंगल में हर बार बाघ सामने आ जाए, यह जरूरी नहीं है। कई बार ऐसा भी हो सकता है कि बाघ आसपास मौजूद हो, आपको देख चुका हो, लेकिन आपकी नजर उस तक न पहुंच पाए।
जंगल सफारी का अनुभव केवल बाघ को देखने तक सीमित नहीं है। जंगल की आवाजों को सुनना, जानवरों के व्यवहार में बदलाव को समझना और प्रकृति की गतिविधियों को करीब से देखना भी सफारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।