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कौन थे संत श्री नारायण गुरु, जिनका बनाया अरुविप्पुरम शिव मंदिर आज भी देता है सामाजिक समरसता का संदेश?

आज महान समाज-सुधारक और क्रांतिकारी संत श्री नारायण गुरु की जयंती है. 19-20वीं शताब्दी में केरल में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ दलितों की आवाज़ बनने वाले श्री नारायण गुरु ने न सिर्फ समाज की जड़ता को तोड़कर नई चेतना जगाई बल्कि जातिगत असमानता और धार्मिक आडंबर के खिलाफ़ ऐसा आंदोलन खड़ा किया, जिसने आधुनिक केरल और भारत के सामाजिक इतिहास को नया मार्ग और दिशा दिखाई. आइये जानते हैं दलितों के उत्थान और समाज सुधार की दिशा उनके महत्वपूर्ण योगदान…

19वीं शताब्दी के केरल में जातिगत भेदभाव लंबे समय से चला आ रहा था. मंदिरों में प्रवेश, शिक्षा पाने और संपत्ति रखने पर मनाही से लेकर निचली समझने जाने वाली जातियों के पहनावों तक भी पाबंदियां थीं. यहां तक कि अस्पृश्य जातियों के सार्वजनिक मार्गों पर चलने पर भी कठोर नियम एवं शर्तें थीं.

वास्तव में केरल में सामाजिक असमानता की जड़े इतनी गहरी थीं कि एक बार स्वयं विवेकानंद ने इसे “पागलखाना” तक कह दिया था. इसी पृष्ठभूमि पर 19वीं और 20वीं सदी के मोड़ पर कई क्रांतिकारी समाज और धर्म सुधार आंदोलनों की शुरुआत हुई. जिसमें सबसे प्रभावशाली आंदोलन का नेतृत्व श्री नारायण गुरु ने किया.

जाति-भेद को चुनौती

उस दौर में केरल में अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव चरम पर था. निचली जातियों का मंदिरों में प्रवेश तक वर्जित था. ऐसे समय में श्री नारायण गुरु ने साहस के साथ आवाज़ उठाई और कहा: “एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर -मानव के लिए.” उनका यह संदेश गूँज बनकर पूरे समाज में फैल गया.

अरुविप्पुरम के ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना

1888 में जब उन्होंने अरुविप्पुरम शिव मंदिर की स्थापना की, तो यह महज़ धार्मिक कदम नहीं था, बल्कि एक क्रांति थी. यह केरल के इतिहास में पहली बार था जब किसी निचली जाति के संत ने मंदिर की स्थापना की और सभी को पूजा का अधिकार दिया. बाद में उन्होंने कई और मंदिर स्थापित किए, जो समानता और बंधुत्व के प्रतीक बने.

शिक्षा से दिखाई मुक्ति की राह

श्री नारायण गुरु का मानना था कि समाज को बदलने की सबसे बड़ी शक्ति शिक्षा है. 1889 में उन्होंने पहला स्कूल वेलुथूर, त्रिशूर ज़िले में खोला था, जिसके बाद उनकी प्रेरणा से कई स्कूल और शैक्षिक संस्थान बने, जिन्होंने दलितों, पिछड़ों और वंचितो के लिए ज्ञान के द्वार खोले.

SNDP योगम और सामाजिक आंदोलन

1903 में उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ श्री नारायण धर्म परिपालना योगम (SNDP) की नींव रखी थी. इस संगठन का उद्देश्य शिक्षा, सामाजिक सुधार और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में कार्य करना था. SNDP ने हज़ारों लोगों को संगठित किया और दलित समाज में आत्मसम्मान की भावना जगाई.

मानव जाति की सेवा ही ईश्वर की पूजा है

श्री नारायण गुरु का दर्शन अद्वैत वेदांत पर आधारित था, लेकिन उन्होंने उसे जीवन से जोड़ा. उन्होंने मानव जाति की सेवा को ईश्वर की सच्ची पूजा बताया और मानवता पर संदेश दिया. उनकी रचनाएं ‘आत्मोपदेश शतकं, दर्शनामला’ आज भी आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश देती हैं.

वास्तव में श्री नारायण गुरु का जीवन एक संदेश है कि जब एक संत आध्यात्मिकता को सामाजिक सुधार से जोड़ देता है, तो उसकी आवाज़ पीढ़ियों तक गूंजती रहती है. उनके आदर्श आज भी पूरी मानवता के लिए एक बड़ी विरासत हैं.

news desk

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