नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच टकराव को लेकर एक नया दावा सामने आया है। इजरायली मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब ने हूतियों के साथ तनाव कम करने और हमले रोकने के लिए 1 अरब अमेरिकी डॉलर देने का प्रस्ताव रखा है। भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग 9,500 करोड़ रुपये से अधिक बैठती है, हालांकि वास्तविक राशि विनिमय दर पर निर्भर करेगी।
रिपोर्टों में दावा किया गया है कि यह प्रस्ताव ईरान की मध्यस्थता में हुई बातचीत का हिस्सा था। इसका उद्देश्य सीजफायर लागू कराने और सऊदी अरब पर हूतियों के हमलों को रोकने का रास्ता निकालना बताया गया है।
हालांकि, इस कथित वित्तीय प्रस्ताव की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह कहना फिलहाल सही नहीं होगा कि सऊदी अरब ने हूतियों को वास्तव में इतनी बड़ी रकम दे दी है।
तेहरान पहुंचे सऊदी रक्षा मंत्री, सीजफायर पर बातचीत की चर्चा
इजरायली मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान ने तेहरान की यात्रा की थी। इस यात्रा को क्षेत्रीय तनाव कम करने और हूतियों के साथ सीजफायर की संभावनाओं पर बातचीत से जोड़कर देखा जा रहा है।
रिपोर्टों में दावा किया गया है कि प्रस्तावित व्यवस्था के तहत ईरान के माध्यम से हूतियों तक आर्थिक सहायता पहुंचाने की बात हुई। हालांकि, इस कथित समझौते की पूरी शर्तें और रकम के भुगतान की स्थिति सार्वजनिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं।
एक राजनयिक सूत्र के हवाले से यह भी दावा किया गया कि सऊदी मंत्री जिस हरक्यूलिस सैन्य परिवहन विमान से तेहरान पहुंचे, उसमें रकम भी लाई गई थी। लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, किसी सऊदी अधिकारी ने विमान में नकदी लाए जाने या रकम हस्तांतरित किए जाने की पुष्टि नहीं की है।
हूतियों को पैसा देने के पीछे क्या है सऊदी अरब की रणनीति?
रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब और हूतियों के बीच विवाद का एक प्रमुख मुद्दा पहले हुए समझौतों को लागू करना है। इजरायली मीडिया से बातचीत में एक सऊदी अधिकारी ने वित्तीय लेन-देन की खबरों की पुष्टि नहीं की, लेकिन कहा कि विवाद का एक हिस्सा लगभग तीन साल पहले बनी सहमतियों को लागू करने से जुड़ा है।
इन सहमतियों के तहत हूतियों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सरकारी कर्मचारियों के वेतन के भुगतान और नागरिक बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक सहायता देने की बात बताई गई है।
ऐसी सहायता का उद्देश्य यमन में लंबे समय से जारी संघर्ष के मानवीय और आर्थिक प्रभावों को कम करना हो सकता है। हालांकि, इसके बदले हूतियों की ओर से हमले बंद करने और सीजफायर का पालन करने की शर्तों को लेकर किसी नए समझौते की आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
हूतियों की फंडिंग पर सऊदी अरब का पुराना रुख क्या रहा है?
इजरायली मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब पहले हूतियों को सीधे आर्थिक सहायता देने के मुद्दे पर सतर्क रुख अपनाता रहा है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि रियाद किसी सैन्य दबाव या हमलों की धमकी के बीच नए सीजफायर को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं रहा है।
हूतियों की ओर से पहले हुए समझौतों को लागू नहीं किए जाने को लेकर शिकायतें किए जाने का भी दावा किया गया है।
इस विवाद की जड़ यमन में लंबे समय से जारी संघर्ष है। हूती विद्रोही देश के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं, जबकि यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार और उसके समर्थकों के साथ उनका संघर्ष जारी रहा है।
ऐसे में किसी भी आर्थिक सहायता या सीजफायर समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित पक्ष किन शर्तों पर सहमत होते हैं और क्या उन शर्तों का पालन सुनिश्चित किया जा सकता है।
सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमलों से बढ़ी चिंता
सऊदी अरब के ऊर्जा प्रतिष्ठानों और अन्य ठिकानों पर हमलों की आशंका खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बड़ा मुद्दा रही है। तेल ठिकानों को निशाना बनाए जाने से ऊर्जा आपूर्ति, निवेश और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और टैंकरों की आवाजाही में बाधा की खबरें भी वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए चिंता का विषय हैं। इस मार्ग से बड़ी मात्रा में तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है।
हालांकि, इन घटनाओं को हूतियों के कथित वित्तीय प्रस्ताव से सीधे जोड़ने के लिए अलग-अलग घटनाओं और उनके पीछे जिम्मेदार पक्षों की पुष्टि जरूरी है।
ईरान की मध्यस्थता से क्या निकल सकता है रास्ता?
रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने सऊदी अरब और हूतियों के बीच तनाव कम कराने के लिए मध्यस्थता की पेशकश की है। बातचीत में तुर्की और पाकिस्तान से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों की भागीदारी का भी दावा किया गया है।
सऊदी विदेश मंत्रालय ने तेहरान यात्रा को क्षेत्रीय संकट के बीच तनाव कम करने, संवाद को बढ़ावा देने और कूटनीतिक समाधान के प्रयासों से जोड़कर बताया था। बयान में कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता संबंधी कोशिशों के समर्थन का भी उल्लेख किया गया।
लेकिन केवल बातचीत या आर्थिक सहायता के प्रस्ताव से संघर्ष समाप्त होने की गारंटी नहीं है। इसके लिए सीजफायर की स्पष्ट शर्तें, हमलों पर रोक और समझौतों के पालन की प्रभावी व्यवस्था जरूरी होगी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 1 अरब डॉलर का कथित प्रस्ताव सऊदी अरब और हूतियों के बीच तनाव कम करने की वास्तविक पहल है या बातचीत के दौरान सामने आया एक अपुष्ट दावा। जब तक संबंधित पक्ष इसकी पुष्टि नहीं करते, इसे किसी अंतिम समझौते या भुगतान के रूप में पेश करना जल्दबाजी होगी।