बिहार SIR पर उठे सवाल
बिहार में बहुचर्चित SIR के बाद मतदाताओं की फाइनल वोटर लिस्ट जारी कर दी गई है. लेकिन इसको लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं. नई सूची में कुल मतदाताओं की संख्या बढ़कर 7 करोड़ 42 लाख हो गई है, जो पहले 7 करोड़ 24 लाख थी. इस बढ़ोतरी के बावजूद, कई सवाल खड़े हो रहे हैं और इस आंकड़े को “राहत की खबर” मानने पर विशेषज्ञों और चुनाव निगरानी से जुड़े लोगों ने आपत्ति जताई है.
पूर्व चुनाव विश्लेषक योगेन्द्र यादव ने बताया की ‘भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में जुलाई 2025 तक कुल वयस्क जनसंख्या 8 करोड़ 18 लाख है. पिछली वोटर लिस्ट में 7 करोड़ 89 लाख नाम दर्ज थे. सामान्य अनुमान था कि करीब 29 लाख नए वोटर जुड़ेंगे, लेकिन वास्तविकता में 47 लाख नाम कम हो गए, जो चिंता का विषय है.
क्या सिर्फ बिहार में लगी है ‘ब्रेक’?
एक्स पर योगेन्द्र यादव कहते हैं कि ‘यह जरूर उल्लेखनीय है कि जिस बड़े पैमाने पर नाम हटने की आशंका थी, कुछ अनुमानों में यह संख्या 65 लाख तक मानी जा रही थी वह नहीं हुआ. लेकिन यह राहत सिर्फ बिहार तक सीमित है. देश के अन्य राज्यों की स्थिति पर अभी कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता’.
चुनाव आयोग ने SIR (Special Summary Revision) की प्रक्रिया पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है. बताया जा रहा है कि इस बार के गणना फॉर्म का 15–20% हिस्सा खुद BLO (Booth Level Officer) द्वारा भरा गया, न कि आम नागरिकों द्वारा. जिससे संदेह की स्थिति बनी है.
चुनाव आयोग ने इस बार 2003 की वोटर लिस्ट को आधार बनाते हुए कुछ छूटें दी हैं. जिन लोगों का नाम 2003 में था, या जिनके माता पिता या रिश्तेदार उस समय सूची में थे, उन्हें मतदाता सूची में शामिल करने में लचीलापन बरता गया. हालांकि ये छूटें आधिकारिक आदेशों या SIR के दस्तावेज़ों में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं, और न ही ये देश के अन्य राज्यों पर लागू होती हैं.
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और आधार की अनिवार्यता
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के चलते आयोग को आधार कार्ड को पहचान के रूप में स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा. हालांकि, यह आदेश अभी देशभर में समान रूप से लागू नहीं हुआ है. जब तक इसे राष्ट्रीय स्तर पर नहीं लागू किया जाता, तब तक नाम कटने और सूची में अनियमितता का खतरा बना रहेगा.
फिलहाल बिहार में मतदाता सूची में भारी कटौती नहीं हुई, यह सकारात्मक संकेत हो सकता है. लेकिन जब तक SIR प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्ट और स्थायी संशोधन नहीं किया जाता, तब तक यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि मतदाता सूची पूरी तरह पारदर्शी और सुरक्षित हो गई है.
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