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जब दूल्हे को निभानी पड़ी ‘सलाम’ की प्रथा! प्रख्यात लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने क्यों उठाए इस रिवाज पर सवाल?

शादियों में मेहंदी, वरमाला, फेरे और मंगलसूत्र पहनाने समेत तमाम रस्मों रिवाज तो निभाए जाते हैं. लेकिन क्या हो जब आपको सलाम की प्रथा निभानी पड़े.

समाज में सलाम प्रथा एक ऐसी परंपरा रही है, जिसने सामाजिक असमानता और ऊंच-नीच की खाई को और गहरा किया. इस प्रथा के तहत नीची समझी जाने वाली जातियों को ऊंची जाति के लोगों के सामने झुककर, हाथ जोड़कर या विशेष अंदाज़ में सलाम करना पड़ता था. पर ये केवल अभिवादन नहीं, बल्कि सामाजिक हैसियत और अधीनता का प्रतीक था. कई बार तथाकथित नीची जातियों को बिना इच्छा के भी यह करना पड़ता था, क्योंकि इसे न मानने पर अपमान, दंड या बहिष्कार झेलना पड़ता था.

हिंदी में दलित साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा ‘जूठन’ में उस दौर के समाज में प्रचलित इस कुप्रथा के बारे में जिक्र किया है. यह प्रसंग केवल उनका निजी अनुभव नहीं है, बल्कि उस सामूहिक पीड़ा का बयान है जिसे उनके समाज ने पीढ़ियों तक झेला.
अपने दोस्त की शादी को याद करते हुए वे लिखते हैं कि तब वे नवीं क्लास में थे, जब बस्ती में रहने वाले उनके दोस्त हिरम सिंह की शादी हुई थी. उस बरात में ओमप्रकाश वाल्मीकि भी अपने पिता के साथ पहुंचे थे.

बस्ती के लोगों, नाते-रिशतेदारों के जमावड़े, नाच-गाने के बीच बारात में जाने का उत्साह ही कुछ और था. हिरम सिंह के सबसे करीबी मित्र होने के नाते शादी की तमाम रस्मों-रिवाजों में वे ही दूल्हे के साथ आगे-आगे चल रहे थे. पर मामला वहां अटक गया, जब ओमप्रकाश जी को पता चला कि शादी संपन्न होने के बाद अब उन्हें दूल्हे के साथ ऊंची जाति के लोगों के घर-घर जाकर सलाम प्रथा की परंपरा निभानी होगी.

शादी की सुबह वे हिरम के साथ दुल्हन के घर के आंगन में चारपाई पर बैठ थे. उनके आस-पास हंसी-ठट्‌ठा करती लड़कियों का झुंड मंडरा रहा था. दोनों लोगों को रात के बचे हुए दाल-चावल खाने के लिए दिए गये थे. उन्होंने देखा पास में एक व्यक्ति गले में बड़ा-सा ढ़ोल लटकाए खड़ा था और हिरम की सास और दो-तीन महिलायें ढ़ोलवाले को चलने का इशारा कर रही थीं. दरअसल उनके साथ हिरम को ‘सलाम’ के लिए उन घरों में जाना था, जहां उसकी सास काम करती थी.

वो कहते हैं कि ‘मैंने हिरम सिंह को ‘सलाम’ के लिए जाने से रोकने की कोशिश की पर वह चुपचाप उनके साथ जाने के लिए खड़ा हो गया था.’ तब ओमप्रकाश जी ने कहा, ‘ठीक है, तुम जाओ, मैं नहीं जाऊंगा.’ लेकिन हिरम ने नहीं माना. उसने उनका हाथ पकड़ कर कहा, ‘यार! एक-दो घर जाके जल्दी हो लौट आएंगे. साथ चले चलो.’ आखिरकार हारकर वे अनमने ढंग से चलने के लिए राजी हुए.

सलाम जैसी अपमानजनक प्रथा के दृश्य को वे शब्दों में बयां करते हुए कहते हैं कि गरमी के दिनों में गलियों में भटकते-भटकते दोपहर हो गई थी. ‘हम एक जुलूस की शक्ल में चल रहे थे. सबसे आगे दुल्हन की मां और दो स्त्रियां, उनके पीछे ढोल बजानेवाला, फिर हम दोनों, उसके बाद बच्चों का हुजूम…प्रत्येक घर के सामने खड़े होकर ढोल बजानेवाला जोर से ढ़ोल पीटता था, जिसकी आवाज सुनकर औरतें,लड़‌िकयां बाहर आती थी. हिरम सिंह उन्हें सलाम करता था. वे घूंघट के कोनों से हिरम सिंह को ऐसे निहारती थीं जैसे हिरम सिंह को चिड़ियाघर से लेकर आए हैं.’

वे बताते हैं कि इस दौरान घर-घर जाकर सामान मांगने पर किसी-किसी का व्यवहार बेहद रूखा और अपमानजनक होता था. इसके लिए दुल्हन की मां को काफी मिन्नतें करनी पड़ती थीं. लेकिन इस गिड़‌गिड़ाहट का कोई असर दिखाई नहीं पड़ता था. लोग न सिर्फ मुंह बिचकाते थे बल्कि अपमानजनक जातिगत टिप्पणियां भी करते थे.

इस रिवाज से बारात में आने का उनका सारा उत्साह ठंडा पड़ गया था. पसीने से लथपथ जब वे वापस लौटे तो उन्होंने जी भरकर पानी पिया. इस तरह पानी पीते हुए देख पानी पिलानेवाले ने उनसे कहा- ‘बरले में सूखा पड़ गया है क्या?’
तब वे बोले थे ‘नहीं! सलाम ने मेरा पानी सोख लिया है.’
ओमप्रकाश वाल्मीकि के इस मार्मिक कथन को वह आदमी कितना समझ पाया था, ये तो नहीं पता, पर उस समय उनका दिलोदिमाग बहुत अशांत हो गया था. ‘सलाम’ के लिए दर-दर भटकने की पीड़ा ने उन्हें बेहद थका दिया था. वे लिखते हैं कि ‘दोपहर के खाने में सूअर का मीट और रोटी बनी थी. शराब पीकर कई लोग हो-हल्ला कर रहे थे. नीम के पेड़ तले चारपाइयों पर लोग ऊंघ रहे थे. खाना खिलाने और बरात के विदा करने की गहमागहमी में मैं एक किनारे चुपचाप बैठा था. मेरे मन में जैसे कुछ उबल रहा था.’

उन्हें इस तरह चुपचाप बैठा देखकर उनके पिता ने पूछा, ‘ऐसे क्यूं बैठे हो मुंशी जी?’
तब उन्होंने पिता के सवाल का जवाब देने के बजाय, एक जलता हुआ सवाल तेजी से दागा था, ‘ये सलाम के लिए जाना क्या ठीक है ?’ उनकी आवाज़ का तीखापन छिप नहीं पाया था.
वे कहते हैं उनके सवाल पर पिता ने ऐसे घूरा जैसे उन्हें पहली बार देख रहे हों. पिता को चुप देखकर उनके मन की उथल-पुथल बाहर आने लगी थी. उन्होंने कहा- ‘अपनी ही शादी में दूल्हा घर-घर घूमे… बुरी बात है… बड़ी जातवालों के दूल्हे तो ऐसे कहीं नहीं जाते…और तो और अब ये दुल्हन भी बरला जाकर ऐसे ही घर-घर जाएगी सलाम करने…’

पिता उनकी बात खामोशी से सुन रहे थे. अचानक उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए गंभीरता से कहा- ‘मुंशी जी, बस, तुझे स्कूल भेजना सफल हो गिया है… म्हारी समझ में बी आ गिया है… ईब इस रीत कू तोड़ेंगे.’

ओमप्रकाश वाल्मीकि बताते हैं कि पिताजी ने सचमुच इस रीत को अपने ही घर से तोड़ा था. जब उनके भाई जनेसर की बरात गई थी तो पिताजी ने साफ मना करते हुए कहा कि, ‘मेरा बेटा सलाम करने नहीं जाएगा.’ इसके बाद बहन की शादी में भी उन्होंने दामाद को ‘सलाम’ पर नहीं जाने दिया था. ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं कि देखने-सुनने में यह बहुत साधारण-सी बात लग सकती है. लेकिन यह ऐसी प्रथा है जिससे दूल्हा हो या दुल्हन, शादी के पहले ही दिन उनमें हीनता बोध भर दिया जाता है.

‘सलाम’ जैसी परंपराएं सिर्फ रस्में नहीं थीं, बल्कि जातीय वर्चस्व की जंजीरें थीं. शादी जैसे खुशियों के मौके पर दूल्हों को घर-घर झुकाया जाता और दुल्हनों को अजनबियों के सामने अपमानित किया जाता. ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा का यह प्रसंग बताता है कि कैसे बचपन के अनुभव आत्मसम्मान की पीड़ा बनकर उनके दिल में घर कर गए थे. लेकिन इसी दर्द ने बदलाव की राह भी दिखाई. उनके पिता ने ‘सलाम’ की प्रथा को अपने घर से खत्म कर यह साबित किया कि अन्यायपूर्ण परंपराएं टूट सकती हैं.

news desk

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