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वह विचारक जिसने सिखाया ‘हर चीज़ पर शक करो’, खुद किस सच से भागता रहा? एपस्टीन चोमस्की के रिश्तों के खुलासों से क्यों हिल गए लेफ्टिस्ट ?

कल्पना कीजिए—आप दशकों तक किसी को अपना वैचारिक मार्गदर्शक मानते रहे। उसकी किताबों से सीखा, उसके भाषणों से प्रेरणा ली, उसके तर्कों से अपनी दुनिया को समझा। और फिर एक दिन पता चलता है कि वही व्यक्ति, जो आपको सत्ता के काले खेल समझाता था, खुद उसी अंधेरे का हिस्सा था। ठीक यही महसूस कर रहे हैं आज दुनिया भर में नोम चोमस्की के लाखों अनुयायी।
नोम चोमस्की—यह नाम सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी एक विचारधारा का प्रतीक रहा है। जिस आदमी ने हमें सिखाया कि मीडिया कैसे झूठ बेचता है, सरकारें कैसे युद्ध को जायज ठहराती हैं, और अमीर कैसे गरीबों को लूटते हैं—वही आदमी आज खुद उसी व्यवस्था का हिस्सा दिखाई दे रहा है जिसकी वह आलोचना करता था।

एपस्टीन और चोमस्की के रिश्ते !

2025-26 में जारी हुईं एपस्टीन फाइल्स ने जो खुलासे किए हैं, वे दिल दहला देने वाले हैं—न कि इसलिए कि चोमस्की पर कोई अपराध साबित हुआ है, बल्कि इसलिए भी कि जो तस्वीर उभरती है वह हमारी उम्मीदों को चकनाचूर कर देती है।
जेफ्री एपस्टीन—एक ऐसा नाम जो बच्चों के यौन शोषण, अभिजात वर्ग की गंदगी, और सत्ता के सबसे काले चेहरे का प्रतीक बन चुका है। और चोमस्की? वे सिर्फ उससे ‘जानते’ नहीं थे। वे उसके “highly valued friend” थे। उन्होंने खुद यह लिखा—एक पत्र में, जो अब सार्वजनिक है।

क्या आपने कभी सोचा था कि एक ऐसा व्यक्ति जो “Manufacturing Consent” लिखकर बता रहा था कि कैसे ताकतवर लोग हमारी सोच पर काबिज़ होते हैं, खुद उन्हीं ताकतवर लोगों के साथ डिनर कर रहा था? कि जो आदमी अमेरिकी साम्राज्यवाद की धज्जियां उड़ाता था, वह एक दोषी यौन अपराधी के निजी जेट में बैठा हुआ है?

क्या फैंटेसाइज़ करते थे चोमस्की ?

अब तक हमें बताया गया था कि चोमस्की और एपस्टीन के बीच बस “कभी-कभार” की मुलाकातें होती थीं। शायद कुछ अकादमिक बातें, कुछ वित्तीय सलाह। पर सच्चाई बहुत अलग है।
ईमेल्स में जो झलकता है, वह एक गहरे, व्यक्तिगत रिश्ते की तस्वीर है। चोमस्की की पत्नी एपस्टीन के लिए खाना बनाती हैं। कार्ड्स डिजाइन करती हैं। हाल-चाल पूछती हैं। यह कोई औपचारिक संबंध नहीं है—यह परिवारों के बीच की दोस्ती जैसा लगता है।

एक ईमेल में चोमस्की लिखते हैं कि वे एपस्टीन के उस कुख्यात द्वीप के बारे में “फैंटेसाइज़” करते रहते हैं—उस द्वीप के बारे में जहां बच्चियों का शोषण हुआ, जहां दुनिया के सबसे अमीर और ताकतवर लोग अपने सबसे काले राज छुपाते थे।
“फैंटेसाइज़”—यह शब्द पढ़कर आपको कैसा लगता है? मुझे तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने छाती में छुरा घोंप दिया हो।

सलाह जो चुप्पी बन गई

सबसे खतरनाक खुलासा शायद यह है कि जब एपस्टीन पर कानूनी शिकंजा कसने लगा, तो चोमस्की ने उसे क्या सलाह दी? ईमेल्स के मुताबिक—”कुछ बोलो ही मत।” पूरी तरह चुप रहो।
और आज? आज चोमस्की खुद चुप हैं। 2023 में आए स्ट्रोक ने उनकी बोलने की क्षमता छीन ली है।
क्या यह संयोग है? शायद हां। स्ट्रोक एक चिकित्सीय घटना है, उम्र का असर है। लेकिन यह सवाल भी उठना लाजिमी है—क्या यह उसी चुप्पी का विस्तार है जो उन्होंने कभी एपस्टीन को अपनाने की सलाह दी थी?
यह सवाल कठोर है, हो सकता है अनुचित भी हो। लेकिन जब आप दशकों तक लोगों को सिखाते रहे हों कि हर चीज़ पर शक करो, तो लोग आप पर भी शक करेंगे—यह तो तय था।

इंसान या आइकन?

हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि चोमस्की ने कोई अपराध किया। दस्तावेज़ों में ऐसा कोई सबूत नहीं है। उन पर यौन शोषण या किसी गैरकानूनी काम का आरोप नहीं है।

लेकिन क्या अपराध न करना ही काफी है? क्या नैतिकता सिर्फ कानून की किताब में लिखे नियमों तक सीमित है?
चोमस्की जैसा व्यक्ति—जिसने पूरी जिंदगी नैतिक श्रेष्ठता का झंडा लहराया, जिसने दूसरों की नैतिक गिरावट पर सैकड़ों पन्ने लिखे—उसका एक दोषी बाल यौन शोषक के साथ “गहरी दोस्ती” होना कम से कम सवाल तो खड़े करता ही है।
उनके समर्थकों का कहना है—”चोमस्की हमेशा से कहते रहे कि वे हर तरह के लोगों से मिलते हैं, यहां तक कि युद्ध अपराधियों से भी, ताकि सत्ता को समझ सकें।”

ठीक है। मान लेते हैं। लेकिन इंटरव्यू लेने और दोस्ती निभाने में फर्क होता है। किसी को समझने के लिए उससे मिलना एक बात है, लेकिन उसे “highly valued friend” कहना, उसके घर जाना, उसके द्वीप के सपने देखना—यह बिल्कुल अलग बात है।
जो खोया, जो मिला
मैं नहीं चाहता कि चोमस्की का पूरा काम नकार दिया जाए। उन्होंने भाषाविज्ञान में जो योगदान दिया, वह अमूल्य है। उनकी “Manufacturing Consent” आज भी मीडिया को समझने के लिए जरूरी किताब है। अमेरिकी विदेश नीति पर उनकी आलोचनाएं बेशक सही थीं।
लेकिन साथ ही, हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हमने शायद एक इंसान को देवता बना दिया था। हमने सोचा कि जो व्यक्ति इतनी स्पष्टता से सोचता है, वह निजी जीवन में भी उतना ही निर्मल होगा। लेकिन जिंदगी ऐसी नहीं होती।

माइकल पैरेंटी को याद कीजिए

एक दिलचस्प सवाल—जब चोमस्की दुनिया भर में पढ़ाए जा रहे थे, तब माइकल पैरेंटी कहां थे? पैरेंटी ने भी मीडिया, साम्राज्यवाद और वर्ग संघर्ष पर शानदार काम किया। कई मामलों में उनका विश्लेषण चोमस्की से ज्यादा तीखा और स्पष्ट था।
फिर भी पैरेंटी को कभी वह वैश्विक मंच नहीं मिला जो चोमस्की को मिला। क्यों? क्या इसलिए कि पैरेंटी खुलकर मार्क्सवादी थे, जबकि चोमस्की “लिबर्टेरियन सोशलिस्ट” थे—एक ज्यादा सुरक्षित, ज्यादा स्वीकार्य लेबल?
आज जब चोमस्की की नैतिक छवि धूमिल हो रही है, तो यह सवाल और मजबूत हो जाता है—किन आवाजों को चुना गया, किन्हें दबाया गया, और क्यों?

भारत में भी सवाल

भारत में भी, खासकर वामपंथी और लिबरल हलकों में, चोमस्की को लगभग संत की तरह पढ़ाया जाता रहा है। JNU से लेकर जादवपुर तक, चोमस्की को कोट करना एक तरह से बौद्धिक होने का प्रमाण माना जाता था।
आज वही लोग असमंजस में हैं। क्या करें? उनके काम को खारिज कर दें? या उनके व्यक्तित्व की कमजोरियों को नज़रअंदाज़ कर दें?
शायद सही रास्ता यह है कि हम समझें—बौद्धिक योगदान और व्यक्तिगत नैतिकता अलग-अलग चीजें हैं। चोमस्की ने जो सिखाया वह कीमती है, लेकिन चोमस्की खुद कोई आदर्श नहीं थे।

97 साल और एक असहज सच

आज 97 साल के चोमस्की साओ पाउलो में बैठे हैं, बोल नहीं सकते, चल नहीं सकते। शायद सोचते होंगे—कौन जानता था कि जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर यह सब सामने आएगा?

उनकी पत्नी वैलेरिया उनकी देखभाल कर रही हैं। दुनिया भर में उनके बारे में बहसें हो रही हैं। और वे खुद चुप हैं—शायद मजबूरी से या शायद कुछ और…

अगर इस पूरे प्रकरण से एक सबक मिलता है, तो वह यह—किसी को भी, कितना भी प्रतिभाशाली हो, अंधे भरोसे का पात्र मत बनाओ।

चोमस्की ने हमें सिखाया—सवाल करो, शक करो, जांचो। तो आज हम यही कर रहे हैं—उन्हीं पर। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है। न कि वे जो थे, बल्कि वे जो सिखा गए—कि हर किसी पर, यहां तक कि खुद पर भी, सवाल उठाने का हक हमारा है।


तो क्या करें? चोमस्की को पूरी तरह खारिज कर दें? या उनकी कमजोरियों को माफ कर दें?

शायद दोनों ही नहीं। शायद हम सिर्फ यह स्वीकार करें कि दुनिया जटिल है, लोग विरोधाभासी हैं, और कोई भी व्यक्ति—चाहे वह कितना भी महान हो— सिर्फ इंसान ही है। चोमस्की ने हमें बहुत कुछ दिया। लेकिन वे कोई भगवान नहीं थे। न होने का दावा किया। तो शायद हमें भी उन्हें उसी रूप में देखना चाहिए—एक प्रतिभाशाली, लेकिन खामियों से भरा इंसान।

news desk

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