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राहुल गांधी मानहानि केस: सावरकर के परपोते सात्यकी ने नाथूराम गोडसे के RSS सदस्यता की बात मानी!

पुणे की विशेष MP-MLA अदालत में राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान सावरकर के परपोते सात्यकी सावरकर की जिरह में गांधी हत्याकांड से जुड़े कई सवाल सामने आए। सात्यकी ने जिरह के दौरान कहा कि उनके नाना गोपाल गोडसे और नाथूराम गोडसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सक्रिय सदस्य थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि नाथूराम गोडसे और गोपाल गोडसे आपस में सगे भाई थे और सावरकर तथा गोडसे परिवार के बीच रिश्तेदारी थी।

कोर्ट में क्या बोले सात्यकी सावरकर?

राहुल गांधी की ओर से पेश वकील मिलिंद पवार ने सात्यकी सावरकर से जिरह की। इसी दौरान सात्यकी से उनके पारिवारिक संबंधों और महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों पर सवाल पूछे गए।

जिरह के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी मां, गोपाल गोडसे की बेटी थीं। गोपाल गोडसे, नाथूराम गोडसे के सगे भाई थे। इस तरह उन्होंने सावरकर और गोडसे परिवार के बीच रिश्तेदारी की बात भी मानी।

सात्यकी ने यह भी माना कि नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या की थी।

‘नाथूराम और गोपाल गोडसे RSS के सक्रिय सदस्य थे’

जिरह में सबसे अहम सवाल गोडसे बंधुओं के RSS से संबंध को लेकर आया। रिपोर्ट के मुताबिक, सात्यकी सावरकर ने कहा कि नाथूराम गोडसे और उनके भाई गोपाल गोडसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय सदस्य थे।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि नाथूराम गोडसे हिंदू महासभा के सदस्य थे। हालांकि, जिरह के दौरान सात्यकी ने नाथूराम गोडसे की संगठनात्मक भूमिका और कुछ अन्य ऐतिहासिक संदर्भों के बारे में जानकारी होने से इनकार किया।

महत्वपूर्ण: RSS से जुड़ी यह बात यहां सात्यकी सावरकर की अदालत में जिरह के दौरान कही गई बात के रूप में सामने आई है। यह किसी अदालत के अंतिम निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं की जा रही है।

गांधी हत्या मामले में कौन-कौन आरोपी थे?

सात्यकी के बयान के अनुसार, महात्मा गांधी हत्याकांड में आठ लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, शंकर किस्तैया, गोपाल गोडसे, विनायक दामोदर सावरकर और डॉ. डी.एस. परचुरे शामिल थे।

उन्होंने अदालत में यह भी कहा कि नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी की सजा दी गई थी, जबकि गोपाल गोडसे को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

सावरकर की भूमिका पर क्या हुआ?

जिरह के दौरान सात्यकी ने यह भी स्वीकार किया कि नाथूराम गोडसे, गोपाल गोडसे और विनायक दामोदर सावरकर गांधी हत्या मामले में आरोपी बनाए गए थे।

हालांकि, गांधी हत्या मामले में सावरकर को लेकर ऐतिहासिक और कानूनी स्थिति अलग-अलग स्तरों पर चर्चा का विषय रही है। इसलिए अदालत में किसी तथ्य के स्वीकार किए जाने और अदालत द्वारा उस तथ्य पर अंतिम निष्कर्ष दिए जाने के बीच अंतर है।

बचाव पक्ष ने RSS से जुड़े सवालों पर उठाई आपत्ति

सात्यकी सावरकर के वकील संग्राम कोल्हटकर ने जिरह के दौरान RSS और गांधी हत्या से जुड़े कुछ सवालों की प्रासंगिकता पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि ये सवाल मौजूदा मानहानि मामले से सीधे तौर पर संबंधित नहीं हैं।

अदालत ने फिलहाल सवालों की प्रासंगिकता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर सुनवाई पूरी होने के समय फैसला किया जाएगा।

अब राहुल गांधी की आवाज के सैंपल पर होगी सुनवाई

मामले में एक नया कानूनी मोड़ राहुल गांधी के वॉइस सैंपल को लेकर भी आया है। सात्यकी सावरकर की ओर से अदालत में आवेदन देकर राहुल गांधी की आवाज का नमूना लेने की मांग की गई है।

आवेदन में कहा गया है कि राहुल गांधी के आवाज के नमूने की तुलना लंदन में दिए गए कथित भाषण की रिकॉर्डिंग से फॉरेंसिक तरीके से की जाए। ऐसी मांग पहले भी अदालत के सामने रखी जा चुकी है।

राहुल गांधी की ओर से इस मांग का विरोध किया गया है और उनके वकील से लिखित जवाब मांगा गया है।

क्या है राहुल गांधी-सावरकर मानहानि मामला?

यह मामला राहुल गांधी के मार्च 2023 में लंदन में दिए गए भाषण से जुड़ा है। सात्यकी सावरकर ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने अपने भाषण में विनायक दामोदर सावरकर से जुड़ी ऐसी घटना का उल्लेख किया, जो उनके मुताबिक सावरकर ने अपनी किसी किताब में नहीं लिखी थी।

इसी आधार पर सात्यकी ने 2023 में पुणे की अदालत में राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि की शिकायत दाखिल की थी। मौजूदा सुनवाई में सात्यकी की जिरह चल रही है और राहुल गांधी की ओर से उनके बयान तथा मामले से जुड़े तथ्यों पर सवाल किए जा रहे हैं।

आगे क्या होगा?

अब अदालत में सात्यकी सावरकर की जिरह के साथ-साथ राहुल गांधी के आवाज के नमूने से जुड़ी अर्जी पर भी सुनवाई आगे बढ़ेगी। इस मामले में अंतिम फैसला अभी नहीं आया है, इसलिए अदालत में दर्ज बयानों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

news desk

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