पणजी: 15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश ब्रिटिश शासन से आजादी का जश्न मना रहा था, तब भारत का एक हिस्सा ऐसा भी था जो स्वतंत्र नहीं हुआ था। यह हिस्सा गोवा था, जहां अंग्रेजों का नहीं बल्कि पुर्तगालियों का शासन था। भारत सरकार ने गोवा को शांतिपूर्ण तरीके से भारत में शामिल करने के लिए पुर्तगाल से बातचीत की, लेकिन कई वर्षों तक इसका कोई समाधान नहीं निकला। आखिरकार दिसंबर 1961 में भारत ने ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया और 19 दिसंबर को गोवा पुर्तगाली शासन से मुक्त होकर भारत का हिस्सा बना।
भारत के बड़े हिस्से पर जहां ब्रिटिश शासन था, वहीं गोवा का इतिहास अलग रहा। पुर्तगाली सेनाओं ने 1510 में गोवा पर कब्जा किया और इसे अपने औपनिवेशिक साम्राज्य का हिस्सा बना लिया। इसके बाद करीब 451 वर्षों तक गोवा पुर्तगाली शासन के अधीन रहा।
यही वजह थी कि 1947 में ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद भी गोवा भारत में शामिल नहीं हो सका। पुर्तगाल का दावा था कि गोवा उसके क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा है और वह इसे भारत को सौंपने के लिए तैयार नहीं था।
भारत की आजादी के बाद गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराने की मांग ने भी जोर पकड़ा। गोवा के भीतर और देश के दूसरे हिस्सों में कई संगठनों ने पुर्तगाली शासन के खिलाफ आंदोलन चलाए। इस संघर्ष में लिबिया लोबो सरदेसाई का भी अहम योगदान रहा।
लिबिया लोबो सरदेसाई ने अपने सहयोगी वामन सरदेसाई के साथ मिलकर ‘वॉयस ऑफ फ्रीडम’ नाम का गुप्त रेडियो स्टेशन चलाया। इसका उद्देश्य गोवा के लोगों तक स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी सूचनाएं और संदेश पहुंचाना था।
लिबिया लोबो सरदेसाई के मुताबिक, 1947 में भारत की आजादी के बाद वह गोअन यूथ लीग से जुड़ी थीं। 1955 के बाद आर्थिक नाकेबंदी के कारण गोवा के लोगों तक बाहरी दुनिया की खबरें पहुंचना मुश्किल हो गया था। ऐसे में उन्होंने भूमिगत रेडियो प्रसारण शुरू किया।
यह रेडियो स्टेशन नवंबर 1955 से दिसंबर 1961 तक गोवा की सीमावर्ती जंगलों से संचालित किया गया। रेडियो के जरिए लोगों तक स्वतंत्रता आंदोलन की खबरें और प्रेरक संदेश पहुंचाए जाते थे। इससे गोवा के लोगों का मनोबल बनाए रखने में भी मदद मिली।
लिबिया लोबो सरदेसाई के अनुसार, गुप्त रेडियो स्टेशन से रोज सुबह और शाम कोंकणी तथा पुर्तगाली भाषाओं में प्रसारण किया जाता था। पुर्तगाली सेना इस रेडियो स्टेशन की तलाश करती रही, लेकिन उसे पकड़ नहीं सकी।
रेडियो प्रसारण उस दौर में पुर्तगाली शासन के प्रचार के सामने गोवा के लोगों तक आंदोलन की आवाज पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बना रहा।
गोवा को लेकर भारत और पुर्तगाल के बीच कई वर्षों तक कूटनीतिक प्रयास चलते रहे, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। दिसंबर 1961 में भारत सरकार ने सैन्य कार्रवाई का फैसला किया। पुर्तगाली बलों द्वारा भारतीय मछुआरों पर गोलीबारी की घटना के बाद घटनाक्रम और तेज हो गया।
इसके बाद भारत ने ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया। भारतीय थल सेना, वायु सेना और नौसेना ने संयुक्त अभियान चलाया। करीब 36 घंटे तक चले अभियान के बाद गोवा के तत्कालीन गवर्नर जनरल मैनुअल एंटोनियो वासालो ई सिल्वा ने आत्मसमर्पण पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।
19 दिसंबर 1961 को गोवा औपचारिक रूप से भारत का हिस्सा बन गया। इस तरह भारत के क्षेत्रीय एकीकरण का एक अहम अध्याय पूरा हुआ।
गोवा की मुक्ति को याद करते हुए लिबिया लोबो सरदेसाई ने बताया था कि जब उन्हें पुर्तगालियों के आत्मसमर्पण की खबर मिली, तो वह उनकी जिंदगी का सबसे खुशी भरा पल था।
उन्होंने यह भी बताया कि 15 दिसंबर 1961 को तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन का संदेश उनके रेडियो स्टेशन से प्रसारित किया गया था। इस संदेश में पुर्तगाली सेना से बातचीत की अपील की गई थी।
भारत में शामिल होने के बाद गोवा को दमन और दीव के साथ केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। इसके बाद 30 मई 1987 को गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और वह भारत का 25वां राज्य बना।
आज गोवा अपने समुद्र तटों, प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक चर्चों, मंदिरों और भारतीय-पुर्तगाली सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। लेकिन इसके इतिहास की सबसे खास बात यह है कि 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से भारत की आजादी के बावजूद गोवा पुर्तगाली शासन के अधीन रहा और करीब 14 साल बाद 19 दिसंबर 1961 को भारत का हिस्सा बना।
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