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Indian Press House > Blog > Trending News > जब जेल की कोठरी में भगत सिंह को देख कर भावुक हुए नेहरू! भगत सिंह के खत से खुलते हैं नेहरू के राज ?
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जब जेल की कोठरी में भगत सिंह को देख कर भावुक हुए नेहरू! भगत सिंह के खत से खुलते हैं नेहरू के राज ?

news desk
Last updated: September 27, 2025 12:25 pm
news desk
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नेहरू भगत सिंह मुलाकात लाहौर जेल
नेहरू भगत सिंह मुलाकात लाहौर जेल
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पिछले कुछ वर्षों से देश में इस बात की बहुत चर्चा होती है कि नेहरू कभी जेल में भगत सिंह से मिलने नहीं गए. इस चर्चा का उद्देश्य नेहरू को कटघरे में खड़ा करना ही लगता है. लेकिन दोनों के बीच पहली मुलाकात कब हुई, और भगत सिंह क्यों नेहरू से प्रभावित हुए. ये जानने के लिए व्हाटस ऐप की बजाए इतिहास की पगडंडियों पर चहलकदमी करनी पड़ेगी. अतीत में दर्ज हो चुके इस प्रसंग को समझने के लिए भगत सिंह के जन्मदिन से बेहतर अवसर क्या हो सकता है?

लाहौर सेंट्रल जेल की ऊंची-ऊंची दीवारें, भीतर पसरा सन्नाटा और कोठरियों में कैद सैकड़ों सपनों की धड़कन. यही वह जगह थी, जहां 1929 से 30 तक भारत का इतिहास अपनी नई दिशा तय कर रहा था.

जेल के भीतर अमानवीय व्यवहार और अंग्रेज़ी हुकूमत की सख्ती के खिलाफ कैदियों ने भूख हड़ताल छेड़ दी थी. जिस हड़ताल का नेतृत्व कोई बुज़ुर्ग नेता नहीं, बल्कि बीस बरस का एक नौजवान कर रहा था, जिसका नाम जेल के बाहर लाखों युवाओं को देशभक्ति की प्रेरणा भी देता वो नाम था ‘भगत सिंह’.

भगत सिंह की यह भूख हड़ताल सिर्फ जेल में मिलने वाले खाने और सुविधाओं की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह प्रतीक थी, औपनिवेशिक शासन की क्रूरता और भारतीय कैदियों के प्रति भेदभाव की.

जब ट्रिब्यून अखबार की सुर्खियां बन गई थीं जेल की वो मुलाकात

जब भगत सिंह अपने तरीके से अंग्रेजों के शासन का विरोध कर रहे थे बिलकुल उसी समय पंडित जवाहरलाल नेहरू गांधी के रास्तों पर चलते हुए कांग्रेस के स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दिखा रहे थे. 8 अगस्त 1929 को जवाहरलाल नेहरू, भगत सिंह से मिलने लाहौर जेल पहुंचे. यह नेहरू का भगत सिंह से पहला साक्षात्कार था. असेंबली बम कांड में गिरफ्तार भगत सिंह लाहौर सेंट्रल जेल में उस समय बंद थे.

उस दौर के प्रमुख अखबार ट्रिब्यून ने इस मुलाकात की रिपोर्ट को विस्तार से छापा था, क्योंकि यह घटना उस समय की राजनीतिक हलचलों में तो अलग मायने रखती ही थी बल्कि कोई नहीं जानता था कि भविष्य में यानी आज के दौर में ये रिपोर्ट फैक्ट चेक के काम आएगी.

नेहरू जेल की तंग कोठरी में पहुंचे तो सामने एक दुबला-पतला नौजवान खड़ा था. भूख हड़ताल के कारण शरीर कमजोर दिखता था, लेकिन चेहरे पर तेज और आंखों की दृढ़ता किसी तरह कम न हुई थी. यही वह क्षण था जब नेहरू और भगत सिंह पहली बार से आमने सामने मिले थे.

नेहरू अपनी आत्मकथा An Autobiography में लिखते हैं कि, ‘पहली बार मैंने भगत सिंह को देखा. उनका चेहरा आकर्षक और बौद्धिक था.’

यह वाक्य किसी सामान्य कैदी के लिए नहीं लिखा गया था. यह उस नौजवान के लिए था जिसने अदालतों को अपने विचारों का मंच बना दिया था और जेल की कोठरी से पूरे राष्ट्र की कल्पना को एक दिशा दी थी.

नेहरू के दिल पर दर्ज हो गया था भगत सिंह का प्रभाव

नेहरू इस मुलाक़ात से भीतर तक प्रभावित हुए थे. यह केवल एक राजनीतिक भेंट नहीं थी, बल्कि विचारों और साहस का टकराव भी था. एक ओर कांग्रेस का नेतृत्व था, जो संवैधानिक संघर्ष और जनआंदोलन पर भरोसा करता था. तो दूसरी ओर भगत सिंह थे, जिनका मानना था कि दृढ़ प्रतिरोध और सीधी चुनौती से ही अंग्रेज़ी साम्राज्य की जड़ें हिलाई जा सकती है.

इस वैचारिक मतभेद के बावजूद, नेहरू ने जो देखा वह एक अद्भुत साहस और आत्म-बलिदान की झलक थी. नेहरू लिखते हैं.

‘चाहे मैं उनसे सहमत होऊं या नहीं, मेरा दिल भगत सिंह जैसे व्यक्ति के साहस और आत्म-बलिदान के लिए प्रशंसा से भरा है. भगत सिंह जैसा साहस अत्यंत दुर्लभ है.’

लाहौर जेल की ये मुलाक़ात लंबी नहीं थी, मगर इसका असर बहुत गहरा था. ऐसा नहीं था कि सिर्फ नेहरू ही भगत सिंह से प्रभावित हुए. बल्कि भगत सिंह भी नेहरू से बहुत प्रभावित हुए. ये भगत सिंह के लिखे खत से पता चलता है.

भगत सिंह और नेहरु
भगत सिंह और नेहरु

लाहौर जेल की कोठरी में बैठे भगत सिंह जानते थे कि उनका जीवन अब गिनती के दिनों का मेहमान है. लेकिन उनकी कलम थमी नहीं. वे पत्र लिखते रहते और विचारों को दर्ज करते रहे. इन्हीं में से एक काफी महत्वपूर्ण पत्र था, जिसे लिखा गया था, जवाहरलाल नेहरू के नाम, जो आज Collected Works of Bhagat Singh में सुरक्षित है.

उस पत्र में भगत सिंह ने नेहरू से कहा था:
‘आप मज़दूरों और किसानों की बात करते हैं. आप हमें समझ सकेंगे. हमारा विश्वास है कि आप इस क्रांतिकारी आंदोलन को ग़लत नहीं समझेंगे. हमें कांग्रेस से नहीं, उसकी नीतियों से मतभेद है. लेकिन हम मानते हैं कि कांग्रेस में आप जैसे नेता हैं, जिनमें परिवर्तन की ललक है’.

यह पंक्तियां सिर्फ़ एक संवाद नहीं थीं, बल्कि उस दौर की दो धाराओं की सेतु थीं. गांधी-नेहरू-कांग्रेस और भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों की.

इतिहास बताता है कि विचारधाराओं का यह अंतर गहरा था, पर एक बात साफ़ थी. गांधी और नेहरू, दोनों ही भगत सिंह की फांसी नहीं चाहते थे. लेकिन ये चाहत इसलिए सफल नहीं हुई क्योंकि ब्रिटिश सरकार किसी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं थी.

नेहरू और भगत सिंह की लाहौर जेल में हुई यह मुलाक़ात केवल दो नेताओं की भेंट नहीं थी. यह स्वतंत्रता संघर्ष के उस दौर की एक गहरी सच्चाई को उजागर करती है कि विचारधाराओं में चाहे जितना भी अंतर हो, जो लोग देश के स्वतंत्रता सही मायने में चाहते थे वो देश की आज़ादी के लिए एकजुट थे.

यदि किसी को समझना हो तो उसे उसी के द्वारा समझा जा सकता है. आज भगत सिंह और नेहरू के संदर्भ में चाहे जितनी बातें कही जा रही हो, लेकिन भगत सिंह और नेहरू के पत्र और उस वक्त का इतिहास ये बताता है कि दोनों के रास्ते भले ही अलग थे लेकिन लक्ष्य एक ही था. इसलिए नेहरू भगत सिंह की तारीफ करते थे तो भगत सिंह को नेहरू में उम्मीद दिखती थी.

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