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FDI की भारी गिरावट और गिरता रुपया: क्या ‘मोदीनॉमिक्स’ देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रही है?

news desk
Last updated: December 25, 2025 6:43 pm
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FDI की भारी गिरावट और गिरता रुपया
FDI की भारी गिरावट और गिरता रुपया
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियां, जिन्हें ‘मोदीनॉमिक्स’ के नाम से जाना जाता है, शुरुआत में विकास को रफ्तार देने वाली बताई गई थीं। लेकिन हाल के वर्षों में इन नीतियों को लेकर आलोचनाएं तेज होती जा रही हैं। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) में तेज गिरावट, लगातार बढ़ता व्यापार घाटा, डॉलर के मुकाबले रुपये का ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंचना और आर्थिक सुस्ती जैसे संकेतों ने देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अर्थशास्त्रियों और विपक्ष का कहना है कि जमीनी हकीकत प्रचार से मेल नहीं खा रही।

FDI में भारी गिरावट से निवेशकों का भरोसा डगमगाया


मोदी सरकार ने FDI बढ़ाने के लिए कई सुधारों का दावा किया, लेकिन आंकड़े उलटी तस्वीर दिखाते हैं। 2024-25 में नेट FDI में 96% की गिरावट दर्ज की गई और यह घटकर मात्र 353 मिलियन डॉलर रह गया। 2025 में भी स्थिति नहीं सुधरी और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का आउटफ्लो 17–18 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। पूंजी निकासी और आउटवर्ड FDI बढ़ने से नेट इनफ्लो नकारात्मक हो गया, जिसका सीधा असर रोजगार और तकनीकी विकास पर पड़ रहा है।

व्यापार घाटा और रुपये की गिरावट ने बढ़ाई मुश्किलें


देश का व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। अक्टूबर 2025 में यह 41.68 बिलियन डॉलर रहा, जबकि अप्रैल से अक्टूबर के बीच कुल घाटा 78 बिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है। अमेरिका द्वारा लगाए गए 50% टैरिफ के चलते निर्यात में 11.8% की गिरावट आई, वहीं आयात लगातार बढ़ता गया। चीन के साथ व्यापार घाटा 99 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है।
इसी बीच रुपये ने डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की। दिसंबर 2025 में रुपया 90 के पार चला गया और कुछ दिनों में 90.30 तक फिसल गया। 2014 में जहां डॉलर 58–60 रुपये के आसपास था, वहीं अब 90+ का स्तर आम लोगों पर सीधा बोझ डाल रहा है। इससे महंगाई बढ़ी है और विदेश यात्रा, शिक्षा व आयातित सामान और महंगे हो गए हैं।

कांग्रेस की योजनाओं के नाम बदलने से तुलना: ‘विकास’ के नाम पर रीब्रांडिंग


आलोचकों का कहना है कि मोदी सरकार ने कांग्रेस काल की कई योजनाओं के नाम बदलकर उन्हें ‘विकास’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ से जोड़ दिया, लेकिन जमीनी नतीजे कमजोर रहे। कांग्रेस का दावा है कि कम से कम 32 योजनाओं का नाम बदला गया।
निर्मल भारत अभियान को स्वच्छ भारत मिशन बनाया गया, लेकिन शौचालयों के उपयोग और रखरखाव पर सवाल बने रहे। राष्ट्रीय विनिर्माण नीति को मेक इन इंडिया कहा गया, पर विनिर्माण का GDP में हिस्सा 15–16% पर ही अटका रहा। स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया और ग्रामीण विद्युतीकरण जैसी योजनाओं को भी रीब्रांड किया गया, लेकिन बेरोजगारी, डिजिटल डिवाइड और बिजली आपूर्ति की समस्याएं बनी रहीं। विपक्ष का आरोप है कि जैसे इन योजनाओं में नाम बदले गए, वैसे ही मोदीनॉमिक्स में भी प्रचार ज्यादा और परिणाम कम दिख रहे हैं।

आर्थिक चुनौतियों के पीछे कारण और आगे की राह


विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी टैरिफ, वैश्विक अनिश्चितता, मजबूत डॉलर, पूंजी बहिर्वाह और घरेलू नीतिगत कमियां—जैसे नोटबंदी का लंबा असर और सुधारों की कमी—इन समस्याओं के प्रमुख कारण हैं।
हालांकि मोदीनॉमिक्स ने कुछ क्षेत्रों में प्रगति दिखाई है, लेकिन FDI, व्यापार घाटा और रुपये की गिरावट जैसे मुद्दों पर तत्काल ठोस कदम नहीं उठाए गए तो विकास लक्ष्य हासिल करना कठिन हो सकता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अब केवल रीब्रांडिंग नहीं, बल्कि वास्तविक संरचनात्मक सुधारों की जरूरत है, ताकि निवेशकों का भरोसा लौटे और अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिल सके।

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