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सत्ता गई, विधायक टूटे, सांसद हुए बागी… क्या ममता बनर्जी के हाथ से निकल जाएगी TMC?

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस इस समय अपने सबसे बड़े संकट से गुजरती नजर आ रही है। 15 साल तक राज्य की सत्ता पर काबिज रहने वाली पार्टी विधानसभा चुनाव में हार के बाद लगातार झटके झेल रही है। पहले सरकार हाथ से गई, फिर विधायकों में बगावत हुई और अब सांसदों के अलग गुट बनाने के दावे ने ममता बनर्जी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि अब पार्टी और उसके चुनाव चिह्न को बचाए रखना भी नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बीते करीब 40 दिनों में तृणमूल कांग्रेस के भीतर घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला है कि पार्टी की संगठनात्मक ताकत पर ही सवाल उठने लगे हैं।

40 दिन में कैसे बदल गया पूरा सियासी समीकरण?

4 मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आए। चुनाव में भाजपा ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों तक सिमट गई। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब ममता बनर्जी अपनी पारंपरिक भवानीपुर सीट भी नहीं बचा सकीं। इसके साथ ही 15 साल बाद तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।

इसके बाद 3 जून को पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया। 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुन लिया। विधानसभा अध्यक्ष ने भी उन्हें मान्यता दे दी, जबकि पार्टी नेतृत्व किसी अन्य नाम को आगे बढ़ाना चाहता था।

8 जून को संकट और गहरा गया, जब राज्यसभा सदस्य सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। इसी दिन तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों की बैठक के बाद बागी गुट ने दावा किया कि उनके साथ 20 सांसद हैं और उन्होंने काकोली घोष को अपना नेता चुन लिया है। साथ ही एनडीए को समर्थन देने का भी ऐलान किया गया।

आखिर ममता बनर्जी से क्यों नाराज हैं नेता?

बागी नेताओं का कहना है कि उनकी नाराजगी सीधे तौर पर ममता banerjee से नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर फैसले लेने की प्रक्रिया से है। कई नेताओं ने अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि संगठन में संवाद की कमी बढ़ती गई।

ऋतब्रत बनर्जी पहले भी कह चुके हैं कि यह विरोध किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि संगठन के भीतर बढ़ती केंद्रीकृत कार्यशैली के खिलाफ है। उनका दावा है कि पार्टी को पुराने ढांचे और सामूहिक नेतृत्व की ओर लौटना चाहिए।

भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मुद्दों पर भी उठे सवाल

बागी खेमे के कई नेताओं ने राज्य सरकार के कार्यकाल के दौरान सामने आए विवादों और प्रशासनिक फैसलों पर भी नाराजगी जताई है। कुछ नेताओं का कहना है कि विभिन्न मामलों में उठे सवालों का संतोषजनक जवाब संगठन की ओर से नहीं दिया गया।

सुखेंदु शेखर रॉय ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि कुछ मुद्दों पर आवाज उठाने के बाद उन्हें पार्टी के भीतर अलग-थलग महसूस कराया गया। वहीं काकोली घोष ने दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में शासन और संगठन दोनों स्तरों पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हुआ।

अब ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

विधानसभा में बड़ी संख्या में विधायकों और लोकसभा में सांसदों के अलग रुख अपनाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल पार्टी की पहचान और संगठनात्मक नियंत्रण का है। बागी खेमे का दावा है कि उनके पास दो-तिहाई से अधिक जनप्रतिनिधियों का समर्थन है और इसी आधार पर वे खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी दल के दो-तिहाई से अधिक निर्वाचित सदस्य अलग हो जाते हैं तो स्थिति कानूनी और संवैधानिक रूप से काफी जटिल हो जाती है। यही वजह है कि अब पार्टी के भीतर लड़ाई केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि कानूनी मोर्चे पर भी पहुंच चुकी है।

हाईकोर्ट और स्पीकर के फैसलों पर टिकी नजर

तृणमूल कांग्रेस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष मान्यता दिए जाने के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले में जल्द सुनवाई होनी है। दूसरी तरफ लोकसभा में भी बागी सांसदों की स्थिति और उनके दावों पर सभी की नजर बनी हुई है।

सूत्रों के अनुसार बागी सांसद फिलहाल खुद को अलग राजनीतिक गुट के रूप में पेश कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में पार्टी और चुनाव चिह्न पर दावा करने की स्थिति भी बन सकती है।

क्या TMC के अस्तित्व पर खड़ा हो गया है सवाल?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में मौजूदा घटनाक्रम ने तृणमूल कांग्रेस के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक समय राज्य की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत मानी जाने वाली पार्टी अब आंतरिक असंतोष, नेतृत्व विवाद और कानूनी चुनौतियों से जूझ रही है।

ममता बनर्जी के सामने अब केवल राजनीतिक वापसी का ही नहीं, बल्कि पार्टी की एकता बनाए रखने का भी बड़ा इम्तिहान है। आने वाले दिनों में अदालतों, विधायकों, सांसदों और पार्टी नेतृत्व के फैसले यह तय करेंगे कि तृणमूल कांग्रेस इस संकट से उबर पाएगी या बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू होगा।

 

vineet verma

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