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TMC में महाबगावत से कांपा बंगाल! 20 सांसद अलग, ममता पर मंडराया सबसे बड़ा सियासी संकट; क्या शुरू होगा ‘खेला-2’?

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पहले से दबाव झेल रही तृणमूल कांग्रेस अब अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट का सामना कर रही है। पार्टी के भीतर बगावत के सुर इतने तेज हो गए हैं कि अब राजनीतिक गलियारों में ‘खेला-2’ की चर्चा शुरू हो गई है। दावा किया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने पार्टी लाइन से अलग रास्ता चुनने का फैसला कर लिया है, जिससे ममता बनर्जी के नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

पश्चिम बंगाल की सियासत इस समय ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां आने वाले दिनों में बड़े राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इसी वजह से पूरे देश की नजरें अब बंगाल के घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।

दिल्ली में विपक्षी बैठक, उधर पार्टी में बढ़ गया संकट

एक तरफ ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक में शामिल होकर केंद्र सरकार के खिलाफ रणनीति बनाने में जुटे थे, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ गया। विपक्षी गठबंधन की बैठक में कई प्रमुख नेताओं ने हिस्सा लिया और भाजपा के खिलाफ संयुक्त लड़ाई का संकल्प दोहराया।

बैठक के बाद ममता बनर्जी ने संकेत दिए कि अब वह राष्ट्रीय राजनीति में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं और विपक्षी दलों के साथ मिलकर देशभर में अभियान चलाएंगी। लेकिन इसी बीच पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी ने उनके लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है।

तृणमूल कांग्रेस में बन गए तीन शक्ति केंद्र

बगावत के बाद पार्टी के भीतर तीन अलग-अलग गुट उभरते दिखाई दे रहे हैं। पहला गुट ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाला माना जा रहा है। दूसरा गुट काकोली घोष दस्तगीर के नेतृत्व में सक्रिय सांसदों का बताया जा रहा है। वहीं तीसरा गुट विधानसभा में विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी के साथ खड़ा नजर आ रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अलग-अलग शक्ति केंद्र बनने से पार्टी की संगठनात्मक एकता पर बड़ा असर पड़ सकता है और आने वाले समय में यह संघर्ष और तेज हो सकता है।

हाईकोर्ट तक पहुंचा सियासी विवाद

पार्टी के भीतर बढ़ते विवाद के बीच मामला अदालत तक पहुंच गया है। ममता बनर्जी खेमे की ओर से ऋतब्रत बनर्जी गुट को मान्यता देने के खिलाफ याचिका दाखिल की गई है। इस मामले में अदालत 11 जून को सुनवाई कर सकती है।

हालांकि ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि उन्हें किसी कानूनी लड़ाई की चिंता नहीं है क्योंकि बड़ी संख्या में विधायक उनके साथ हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में और नेता उनके गुट में शामिल हो सकते हैं।

कैसे सामने आई सांसदों की बगावत?

दिल्ली में राजनीतिक गतिविधियों के बीच अचानक यह दावा सामने आया कि तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने एनडीए को समर्थन देने का फैसला किया है। काकोली घोष दस्तगीर ने कहा कि समर्थन देने वाले सांसदों के हस्ताक्षर वाली चिट्ठी तैयार है और इसे लोकसभा अध्यक्ष को सौंपने की तैयारी की जा रही है।

बागी सांसदों का कहना है कि वे पार्टी को तोड़ना नहीं चाहते, बल्कि अलग राजनीतिक रुख अपनाकर एनडीए का समर्थन करना चाहते हैं। उनका तर्क है कि पश्चिम बंगाल में जनता ने जिस तरह भाजपा का समर्थन किया, उससे यह स्पष्ट संकेत मिला है कि मतदाता एनडीए की नीतियों को स्वीकार कर रहे हैं।

काकोली घोष ने अलग रास्ता चुनने की बताई वजह

काकोली घोष दस्तगीर का कहना है कि उन्होंने देश की सुरक्षा और राज्य के विकास को प्राथमिकता देते हुए यह फैसला लिया है। उनके मुताबिक अब वह ऐसे राजनीतिक मंच के साथ काम करना चाहती हैं जो विकास और राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाए।

उनके इस बयान ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और इसे तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

8 सांसदों ने बगावत के दावे को बताया गलत

हालांकि पार्टी के भीतर तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं है। 28 सांसदों में से 8 सांसद अभी भी ममता बनर्जी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। इन नेताओं ने 20 सांसदों के अलग होने के दावे को खारिज किया है।

पार्टी के वरिष्ठ नेता कीर्ति आजाद ने कहा कि जिन सांसदों के नाम बगावत करने वालों की सूची में शामिल बताए जा रहे हैं, उनमें से कई नेताओं से उनकी बात हुई है और उन्होंने ऐसे किसी फैसले की पुष्टि नहीं की है।

पार्टी नेतृत्व पर उठने लगे सवाल

दिलचस्प बात यह है कि ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले कुछ नेताओं ने भी मौजूदा हालात पर चिंता जताई है। पार्टी के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि यदि सांसद लंबे समय से दूसरे राजनीतिक दलों के संपर्क में थे तो शीर्ष नेतृत्व को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली।

इसी मुद्दे को लेकर संगठन के भीतर जवाबदेही की मांग भी तेज होती दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा संकट केवल संख्या का नहीं, बल्कि नेतृत्व और संगठनात्मक नियंत्रण की परीक्षा भी है।

क्या है ‘खेला-2’ की चर्चा का मतलब?

बंगाल की राजनीति में ‘खेला-2’ शब्द का इस्तेमाल अब पार्टी के भीतर संभावित बड़े टूट और शक्ति संतुलन में बदलाव के संदर्भ में किया जा रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि असंतोष और बगावत का दायरा बढ़ता है तो तृणमूल कांग्रेस को अपनी राजनीतिक ताकत बचाने के लिए बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

फिलहाल बंगाल की राजनीति बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। आने वाले दिनों में अदालत की सुनवाई, सांसदों की अगली रणनीति और पार्टी नेतृत्व के फैसले यह तय करेंगे कि तृणमूल कांग्रेस इस संकट से उबर पाएगी या फिर बंगाल की राजनीति में वास्तव में ‘खेला-2’ देखने को मिलेगा।

 

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