नई दिल्ली: लंबे समय तक मुफ्त सेवाएं देने के बाद अब मेटा ने अपने प्रमुख प्लेटफॉर्म व्हाट्सऐप, फेसबुक और इंस्टाग्राम के लिए सब्सक्रिप्शन आधारित योजनाओं की शुरुआत कर दी है। कंपनी के इस कदम ने करोड़ों यूजर्स के बीच नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर वर्षों तक फ्री रहने वाले इन प्लेटफॉर्म्स पर अब भुगतान क्यों करना पड़ेगा और इसके पीछे मेटा की क्या रणनीति है।
कितनी है नए सब्सक्रिप्शन प्लान्स की कीमत?
मार्क जुकरबर्ग की अगुवाई वाली मेटा ने अपने विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर पेड सुविधाओं का विस्तार शुरू कर दिया है। कंपनी फिलहाल बिजनेस यूजर्स, कंटेंट क्रिएटर्स और एआई सेवाओं का उपयोग करने वालों के लिए कई नए प्रीमियम फीचर्स की टेस्टिंग कर रही है।
इंस्टाग्राम प्लस और फेसबुक प्लस की मासिक कीमत करीब 99 रुपये रखी गई है। वहीं व्हाट्सऐप प्लस भी लगभग 99 रुपये प्रतिमाह में उपलब्ध है, जिसमें भारत में शुरुआती छह महीने के लिए 50 प्रतिशत तक की छूट दी जा रही है। इसके अलावा कंपनी अधिक उन्नत सुविधाओं वाले प्रीमियम प्लान्स पर भी काम कर रही है।
मेटा वन प्लस प्लान की कीमत लगभग 775 रुपये प्रतिमाह बताई जा रही है, जबकि मेटा वन प्रीमियम की मासिक फीस करीब 1,939 रुपये है। इन योजनाओं में उन्नत एआई सुविधाएं और ज्यादा कंटेंट जनरेट करने जैसी अतिरिक्त सेवाएं शामिल हैं।
दुनियाभर में मेटा के प्लेटफॉर्म्स का रोजाना उपयोग करने वाले लोगों की संख्या करीब 3.5 अरब बताई जाती है, जिससे यह दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल सेवा कंपनियों में शामिल है।
AI पर भारी निवेश बना बड़ी वजह
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि मेटा का सब्सक्रिप्शन मॉडल अपनाने का सबसे बड़ा कारण कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई पर बढ़ता खर्च है। कंपनी इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है।
इसी रणनीति के तहत मेटा ने स्केल एआई के संस्थापक एलेक्जेंडर वांग को अपने सुपरइंटेलिजेंस लैब की जिम्मेदारी सौंपने के लिए करीब 14.3 अरब डॉलर का बड़ा समझौता किया है। हालांकि इस निवेश से मिलने वाले संभावित लाभ को लेकर उद्योग जगत में सवाल भी उठ रहे हैं।
मेटा ने वर्ष 2026 के लिए अपने पूंजीगत खर्च का अनुमान बढ़ाकर 125 अरब डॉलर से 145 अरब डॉलर तक कर दिया है। इस राशि का बड़ा हिस्सा एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा सेंटर और संबंधित तकनीकी परियोजनाओं पर खर्च किया जाएगा।
भारत में भी तेजी से बढ़ रही AI रणनीति
मेटा की एआई योजनाएं केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। भारत में भी कंपनी तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है। इसी क्रम में मेटा ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ साझेदारी की है, जिसके तहत गुजरात के जामनगर में एक बड़े एआई डेटा सेंटर के निर्माण की तैयारी चल रही है।
विशेषज्ञों ने क्या जताई चिंता?
टेक उद्योग के जानकारों का मानना है कि एआई पर होने वाले विशाल निवेश को सही ठहराने के लिए मेटा को नियमित और स्थायी आय के नए स्रोतों की जरूरत है। केवल विज्ञापन आधारित मॉडल भविष्य में पर्याप्त साबित नहीं हो सकता, खासकर तब जब एआई तकनीक कंटेंट उपभोग के तरीके को तेजी से बदल रही हो।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि मेटा अब तक एंटरप्राइज सेक्टर में वैसा भरोसा नहीं बना सका है जैसा माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी कंपनियों ने हासिल किया है। ऐसे में सब्सक्रिप्शन मॉडल कंपनी के लिए कमाई का नया रास्ता बन सकता है, लेकिन आम यूजर्स के लिए इसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा।
कंपनी के भीतर भी चुनौतियां कम नहीं
रिपोर्ट्स के अनुसार एआई पर बड़े पैमाने पर खर्च के साथ-साथ मेटा को आंतरिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। डेटा प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं के चलते इंजीनियरिंग टीमों की जिम्मेदारियों में बदलाव किए जा रहे हैं।
इसके अलावा नए प्रतिभाशाली कर्मचारियों को दिए जा रहे उच्च वेतन पैकेजों को लेकर भी कर्मचारियों के बीच असंतोष की चर्चा है। एआई आधारित पुनर्गठन के दौरान कंपनी ने अपने लगभग 10 प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी भी की, जिसके बाद संगठन के भीतर नाराजगी बढ़ने की खबरें सामने आई हैं।
2030 तक अरबों डॉलर की अतिरिक्त कमाई का अनुमान
वित्तीय संस्थानों के आकलन के मुताबिक सब्सक्रिप्शन सेवाएं आने वाले वर्षों में मेटा के लिए बड़ी आय का स्रोत बन सकती हैं। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक कंपनी को इन योजनाओं से हर साल करीब 20 अरब डॉलर की कमाई हो सकती है।
कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि अगले ही वर्ष सब्सक्रिप्शन आधारित सेवाओं से लगभग 15.6 अरब डॉलर की अतिरिक्त आय मिलने की संभावना है। हालांकि कई बाजार विशेषज्ञ इन अनुमानों को लेकर अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।
अब भी विज्ञापनों पर सबसे ज्यादा निर्भर है Meta
कंपनी के आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष मेटा की कुल आय का लगभग 97.6 प्रतिशत हिस्सा विज्ञापनों से आया था। इससे स्पष्ट होता है कि दो दशक बाद भी कंपनी की कमाई का प्रमुख आधार विज्ञापन ही बना हुआ है।
विश्लेषकों का मानना है कि इसी निर्भरता को कम करने के लिए मार्क जुकरबर्ग अब सब्सक्रिप्शन और एआई आधारित सेवाओं को तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं, ताकि कंपनी के राजस्व स्रोतों में विविधता लाई जा सके।
क्या यूजर्स को पसंद आ रहे हैं पेड फीचर्स?
फिलहाल शुरुआती संकेत बताते हैं कि अधिकांश यूजर्स इन प्रीमियम सुविधाओं को लेकर बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं हैं। प्रोफाइल कस्टमाइजेशन, स्टोरी दोबारा देखने की गिनती, गुप्त स्टोरी व्यू और अतिरिक्त चैट पिन जैसे फीचर्स आम उपभोक्ताओं को भुगतान करने के लिए पर्याप्त आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं।
एआई क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान पेड योजनाएं मुख्य रूप से उन यूजर्स को ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं जो प्लेटफॉर्म का अत्यधिक उपयोग करते हैं। साथ ही इन्हें एआई पर बढ़ते खर्च की भरपाई के लिए एक अस्थायी राजस्व मॉडल के रूप में भी देखा जा रहा है, जब तक कि कंपनी अपने बड़े निवेश से अपेक्षित लाभ हासिल नहीं कर लेती।